MOTHER AND SON KAHANIY
एक दिन आधी रात को मैं टीवी देख रहा था, मुझे किचन में माँ के कदमो की आहट सुनाई दी. उस समय उसे सोते होना चाहिए था मगर वो जाग रही थी. वो ड्रॉयिंग रूम में मेरे पास आई. उसके हाथ में जूस का ग्लास था.
“मैं भी तुम्हारे साथ टीवी देखूँगी?” वो छोटे सोफे पर बैठ गयी जो बड़े सोफे से नब्बे डिग्री के कोने पर था जिस पे मैं बैठा हुआ था. उसने नाइटी पहनी हुई थी जिसका मतलब था वो सोई थी मगर फिर उठ गई थी.
“नींद नही आ रही” मैने पूछा. मेरे दिमाग़ में उसकी टेलिफोन वाली बातचीत गूँज उठी जिसमे उसने कहा था कि कभी कभी उसे चुदवाने की इतनी जबरदस्त इच्छा होती थी कि उसे नींद नही आती. मैं सोचने लगा क्या उस समय भी उसकी वोही हालत है, कि शायद वो काम की आग यानी कामाग्नी में जल रही है और उसे नींद नही आ रही है, इसीलिए वो टीवी देखने आई है. इस बात का एहसास होने पर कि मैं अती कामोत्तेजित नारी के साथ हूँ मेरा बदन सिहर उठा.
वो वहाँ बैठकर आराम से जूस पीने लगी , उसे देखकर लगता था जैसे उसे कोई जल्दबाज़ी नही थी, जूस ख़तम करके वापस अपने बेडरूम में जाने की. जब उसका ध्यान टीवी की ओर था तो मेरी नज़रें चोरी चोरी उसके बदन का मुआइना कर रही थी. उसके मोटे और ठोस मम्मों की ओर मेरा ध्यान पहले ही जा चुका था मगर इस बार मैने गौर किया उसकी टाँगे भी बेहद खूबसूरत थी. सोफे पे बैठने से उसकी नाइटी थोड़ी उपर उठ गयी थी और उसके घुटनो से थोड़ा उपर तक उसकी जाँघो को ढांप रही थी.
शायद रात बहुत गुज़र चुकी थी, या टीवी पर आधी रात को परवीन बाबी के दिलकश जलवे देखने का असर था, मगर मुझे माँ की जांघे बहुत प्यारी लग रहीं थी. बल्कि सही लफ़्ज़ों में बहुत सेक्सी लग रही थी. सेक्सी, यही वो लफ़्ज था जो मेरे दिमाग़ में गूंजा था जब हम दोनो टीवी देख रहे थे या मेरे केस में मैं, टीवी देखने का नाटक कर रहा था. असलियत में अगर मुझे कुछ दिखाई दे रहा था तो वो उसकी सेक्सी जांघे थी और यह ख़याल मेरे दिमाग़ में घूम रहा था कि वो इस समय शायद वो बहुत कामोत्तेजित है.
वो काफ़ी समय वहाँ बैठी रही, अंत में बोलते हुए उठ खड़ी हुई “ओफफ्फ़! रात बहुत गुज़र गयी है. मैं अब सोने जा रही हूँ”
मैं कुछ नही बोला. वो उठ कर मेरे पास गुडनाइट बोलने को आई. नॉर्मली रात को माँ विदा लेते हुए मेरे होंठो पर एक हल्का सा चुंबन लेती थी जैसा मेरे बचपन से चला आ रहा था. वो सिर्फ़ सूखे होंठो से सूखे होंठो का क्षणिक स्पर्श मात्र होता था और उस रात भी कुछ ऐसा ही था, एक सूखा, हल्का सा लगभग ना मालूम होने वाला चुंबन. मगर उस रात उस चुंबन के अर्थ बदल गये थे, क्योंकि मेरे दिमाग़ में उसके कामुक अंगो की धुंधली सी तस्वीरें उभर रही थीं. वो एक हल्का सा अच्छी महक वाला पर्फ्यूम डाले हुए थी जिसने मेरी दशा और भी खराब कर दी. मैं उत्तेजित होने लगा था.
मैं उसे मूड कर रूम की ओर जाते देखता रहा. उसका सिल्की, सॉफ्ट नाइट्गाउन उसके बदन के हर कटाव हर मोड़ हर गोलाई का अनुसरण कर रहा था. वो उसकी गान्ड के उभार और ढलान से चिपका हुआ उसके चुतड़ों के बीच की खाई में हल्का सा धंसा हुआ था. उस दृश्य से माँ को एक सुंदर, कामनीय नारी के रूप में देखने के मेरे बदलाव को पूर्ण कर दिया था.
“माँ कितनी सुंदर है, कितनी सेक्सी है” मैं खुद से दोहराता जा रहा था. मगर उसकी सुंदरता किस काम की! वो आकर्षक और कामनीय नारी हर रात मेरे पिताजी के पास उनके बेड पर होती थी मगर फिर भी उनके अंदर वो इच्छा नही होती थी कि उस कामोत्तेजित नारी से कुछ करें. मुझे पिताजी के इस रवैये पर वाकाई में बहुत हैरत हो रही थी.
मुझे इस बात पर भी ताज्जुब हो रहा था कि मेरी माँ अचानक से मुझे इतनी सुंदर और आकर्षक क्यों लगने लगी थी. वैसे ये इतना भी अचानक से नही था मगर यकायक माँ मेरे लिए इतनी खूबसूरत, इतनी कामनीय हो गयी थी इस बात का कुछ मतलब तो निकलता था. क्यों मुझे वो इतनी आकर्षक और सेक्सी लगने लगी थी? मुझे एहसास था कि इस सबकी शुरुआत मुझे माँ की अपूर्ण जिस्मानी ख्वाहिशों की जानकारी होने के बाद हुई थी, लेकिन फिर भी वो मेरी माँ थी और मैं उसका बेटा और एक बेटा होने के नाते मेरे लिए उन बातों का ज़्यादा मतलब नही होना चाहिए था. उसकी हसरतें किसी और के लिए थीं, मेरे लिए नही, मेरे लिए बिल्कुल भी नही.
अगर उस समय मैं कुछ सोच सकता था तो सिर्फ़ अपनी हसरतों के बारे में, और माँ के लिए मेरे दिल में पैदा हो रही हसरतें. मगर फिर मैं उसकी ख्वाहिश क्यों कर रहा था? क्या वाकाई वो मेरी खावहिश बन गयी थी? मेरे पास किसी सवाल का जवाब नही था. यह बात कि वो कभी कभी बहुत उत्तेजित हो जाती थी और यह बात कि उसकी जिस्मानी हसरतें पूरी नही होती थीं,
इसी बात ना माँ के प्रति मेरे अंदर कुछ एहसास जगा दिए थे. यह बात कि वो चुदवाने के लिए तरसती है, मगर मेरा पिता उसे चोदता नही है, इस बात से मेरे दिमाग़ में यह विचार आने लगा कि शायद इसमे मैं उसकी कुछ मदद कर सकता था. मगर हमारा रिश्ता रास्ते में एक बहुत बड़ी बढ़ा थी, इसलिए वास्तव में उसके साथ कुछ कर पाने की संभावना मेरे लिए नाबराबार ही थी. मगर मेरे दिमाग़ के किसी कोने में यह विचार ज़रूर जनम ले चुका था कि कोशिस करने में कोई हर्ज नही है. उस संभावना ने एक मर्द होने के नाते माँ के लिए मेरे जज़्बातों को और भी मज़बूत कर दिया था चाहे वो संभावना ना के बराबर थी.
ज़्यादातर मैं रात को काफ़ी लेट सोता था, यह आदत मेरी स्कूल दिनो से बन गयी थी जब मैं आधी रात तक पढ़ाई करता था, कॉलेज जाय्न करने के बाद से यह आदत और भी पक्की हो गयी थी. मेरा ज़्यादातर वक़्त कंप्यूटर पर काम करते गुज़रता था मगर माँ के बारे में वो जानकारी हासिल होने के बाद, और जब से मुझे इस बात का एहसास हुया था कि माँ का बदन कितना कामुक है वो कितनी सेक्सी है, और उसकी उपस्थिति में जो कामनीय आनंद मुझे प्राप्त होने लगा था उससे मैं अब टीवी देखने को महत्व देने लगा था. मैं अक्सर ड्रॉयिंग रूम में बैठ कर टीवी देखता और आशा करता कि वो आएगी और मुझे फिर से वोही आनंद प्राप्त होगा.
माँ का ध्यान मेरी नयी दिनचर्या की ओर जाने में थोड़ा वक़्त लगा. शुरू शुरू में वो कभी कभी संयोग से वहाँ आ जाती और थोड़ा वेकार बैठती, और टीवी पर मेर साथ कुछ देखती. मगर जल्द ही वो नियमित तौर पर मेरे साथ बैठने लगी. मगर वो कभी भी लंबे समय तक नही बैठती थी मगर इतना समय काफ़ी होता था एक सुखद एहसास के लिए. मुझे लगा वो घर में अपनी मोजूदगी का किसी को एहसास करवाना चाहती थी
रात को जाने के टाइम उसकी विशेज़ कयि बार ज़ुबानी होती थी, वो हल्के से गुडनाइट बोल देती थी और कयि बार वो हल्का सा होंठो से होंठो का स्पर्श, वो एक सूखा सा स्पर्श मात्र होता था और मेरे ख्याल से वो किसी भी प्रकार चुंबन कह कर नही पुकारा जा सकता था. जो गर्माहट मुझे पहले पहले माँ के चुंबन से होती थी वो समय के साथ उनकी आदत होने से जाती रही. उन चुंबनो में ना कोई असर होता था और ना ही उनका कोई खास मतलब होता था. वो तो सिर्फ़ हमारे विदा लेने की औपचारिकता मात्र थी, एक ऐसी औपचारिकता जिसकी मुझे कोई खास परवाह नही थी.
मैं अपनी पुरानी दिनचर्या की ओर लौट गया और अपना सारा समय फिर से अपने कंप्यूटर पे बिताने लगा. अब आधी रात तक टीवी देखने में वो मज़ा ही नही था जैसा पहले आया करता था. माँ को मेरे फ़ैसले की मालूमात नही थी. पहले ही दिन जब उसने मुझे ड्रॉयिंग रूम से नदारद पाया तो वो मेरे रूम में मुझे देखने को आई.
“आज टीवी नही देखोगे क्या”
“नही, मुझे अपना प्रॉजेक्ट पूरा करना है” मैने बहाना बनाया.
“ओह!” वो थोड़ी निराश लगी, कम से कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ा.
कहने के लिए और कुछ नही था, मगर वो अभी जाना नही चाहती थी. वो बेड के किनारे पर बैठ गयी और टेबल पर से एक मॅगज़ीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी. मैं बिज़ी होने का नाटक करता रहा, और वो चुपचाप मॅगज़ीन में खोई रही. कुछ देर बाद मैने उसे मॅगज़ीन वापस रखते सुना. “ठीक है, मैं चलती हूँ” वो खड़ी होकर बोली.
मैने अपनी कुर्सी उसकी ओर घुमा ली और कहा, “मेरा काम लगभग ख़तम हो चुका है माँ, अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर में हम टीवी देखने चलते हैं”
“नही, नही. तुम पढ़ाई करो” उसने जबाब दिया और मेरी तरफ आई. अब यह हिस्सा कुछ अर्थ लिए हुए था.
शायद मेरा ये अंदाज़ा ग़लत हो के मुझे ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखते ना पाकर वो थोड़ा निराश हो गयी थी, मगर जब वो मुझसे विदा लेने के समय चुंबन लेने आई तो मैने उसके हाव भाव में एक निस्चय देखा और इस बार मेरे मान में कोई संदेह नही था जैसे ज़ुबानी विदा की जेगह वो चुंबन लेकर कोई बात जताना चाहती थी.
मैं थोड़ा आगे को झुक गया और उसके गुडनाइट चुंबन का इंतेज़ार करने लगा. आम तौर पर वो थोड़ा सा झुक कर अपने होंठ मेरे होंठो से छुया देती थी. उसके हाथ उसकी कमर पर होते थे. मगर उस रात उसने अपना दायां हाथ मेरे बाएँ कंधे पर रखा और फिर मुझे वो चुंबन दिया या मेरा चुंबन लिया. मैने इसे महज इतेफ़ाक़ माना और इसे कोई गुप्त इशारा समझ कर इसका कोई दूसरा अर्थ नही निकाला. कारण यह था कि मैं कुर्सी पर बैठा हुआ था ना के सोफे पर, इसीलिए उसे बॅलेन्स के लिए मेरे कंधे पर हाथ रखना पड़ा था. मगर वो चुंबन आज कुछ अलग तरह का था, इसमे कोई शक नही था.
यह कोई बहहुत बड़ी बात नही थी, मगर मुझे लगा कि वो हमारे इकट्ठे बैठने, साथ साथ टीवी देखने की आस लगाए बैठे थी, उसे किसी के साथ की ज़रूरत थी. शायद वो हमारे आधी रात तक ड्रॉयिंग रूम के साथ की आदि हो गयी थी और मेरे वहाँ ना होने पर उससे रहा नही गया था. मुझे उसके चुंबन से उसकी निराशा झलकती दिखाई दी.
तभी वो ख़याल मेरे मन मे आया था.
अगर उसके लिए चुंबन का एहसास बदलना संभव था तो मेरे लिए भी संभव था चाहे किसी और तरीके से ही सही.
जितना ज़्यादा मैं इस बारे में सोचता उतना ही ज़्यादा इसके नतीजे को लेकर उत्तेजित होता गया. जब से मैने उसे कहते सुना था कि वो चुदवाने के लिए तड़प रही है तबसे मेरे अंदर एक ज्वाला सी धधक रही थी. उस ज्वाला की लपटें और भी तेज़ हो जाती जब वो मेरे साथ अकेली आधी रात तक टीवी देखती थी. उसकी फोन वाली बातचीत से मैं जानता था के वो कभी कभी इतनी उत्तेजित होती थी कि उसे रात को नींद नही आती थी. मुझे लगता था कि जब जब वो आधी रात को टीवी देखने आती थी उसकी वोही हालत होती होगी, चाहे मेरे कारण नही मगर अती कामोत्तेजना की हालत में तो वो होती ही थी.
अगर उस दिन भी उसकी वोही हालत थी जब वो मेरे साथ थी तो क्या वो मेरी ओर हसरत से देखेगी? जैसे मैं उसकी ओर देखता था? क्या उसके हृदय मैं भी वोही आग जल रही थी जो मेरे दिल में जल रही थी? क्या यह संभव था कि उसके अंदर की आग को प्रोक्ष रूप से और भड़का दिया जाए ताकि कम से कम वो मेरी ओर किसी दूसरी भावना से देख सके जैसे मैं उसकी ओर देखता था? क्या मैं उसके दिमाग़ में वो विचार डाल सकता था कि मैं उसकी समस्याओ के समाधान की एक संभावना हो सकता हूँ, चाहे वो सिरफ़ एक विचार होता इससे ज़्यादा कुछ नही.
मेरे लिए इन सवालों के जबाब जानने का कोई साधन नही था, मेरा मतलब कि अगर मैं शुरुआत भी करता तो कहाँ से. केयी बार मुझे लगता जैसे मैं उसकी बैचैनि को उसकी अकुलाहट को महसूस कर सकता हूँ मगर वो सिर्फ़ एक अंदाज़ा होता. मैं यकीन से कुछ नही कह सकता था. कोई ऐसा रास्ता नही था जिससे एक इशारा भर ही मिल जाता कि वो कैसे महसूस करती है.
उसके चुंबन ने उसकी कुछ भावनाओ से बग़ावत ज़रूर की थी मगर उनका उस सब से कोई वास्ता नही था जो मैं जानना चाहता था. ज़रूर उसे निराशा हुई थी जब मैं उसका साथ देने के लिए वहाँ नही था मगर वो प्रभाव एक मनोवैग्यानिक था. उसे मेरा साथ अच्छा लगता था इसलिए उसका निराश होना संभव था जब उसका बेटा उसे कंपनी देने के लिए वहाँ मोजूद नही था. मैं उसे किसी और वेजह से निराश देखना चाहता था. चाहे एक अलग तरीके से ही सही मगर मैं एक ज़रूरत पूरी कर रहा था, एक बेटे की तेरह नही बल्कि एक मर्द की तरह. मैं वो जानना चाहता था. मैं महसूस करना चाहता था कि जिस्मानी ज़रूरत पूरी करने की संभावना हमारे बीच मोजूद थी, चाहे वो सिर्फ़ एक संभावना होती और हम उस पर कभी अमल ना करते.
अब अचानक से मैने महसूस किया कि मेरे पास एक मौका है कम से कम ये पता करने का मैं कितने पानी में हूँ. अगर मैं चुंबन को अपनी तरफ से किसी तरह कोई अलग रूप दे सकूँ, उसे एक इशारा भर कर सकूँ, उसे एक अलग एहसास करा सकूँ, उस चिंगारी को जो उसके अंदर दहक रही थी हवा देकर एक मर्द की तरह भड़का सकूँ ना कि एक बेटे की तरह तब शायद मैं किसी संभावना का पता लगा सकूँगा.
उस रात मैं बहुत बहुत देर तक सोचता रहा, और एक योजना बनाने लगा कि किस तरह मैं हमारी रात्रि के चुंबनो में कुछ बदलाव कर उनमे कुछ एहसास डाल सकूँ.
जब मैं नतीजे के बारे में अलग अलग दिशाओं से सोचा तो उत्तेजना से मेरा बदन काँपने लगा. एक तरफ यहाँ मैं यह सोच कर बहुत उत्तेजित हो रहा था कि अगर मैने अपनी योजना अनुसार काम किया तो उसका नतीजा क्या होगा. वहीं दूसरी ओर मुझे अपनी योजना के विपरीत नतीजे से भय भी महसूस हो रहा था. उसकी प्रतिक्रिया या तो सकारात्मक हो सकती थी, जिसमे वो कुछ एसी प्रतिक्रिया देती जो इस आग को और भड़का देती, या फिर उसकी प्रतिक्रिया नकारात्मक होती जिससे उस संभावना के सभी द्वार हमेशा हमेशा के लिए बंद हो जाते जो संभावना असलियत में कभी मोजूद ही नही थी.
अब योजना बहुत ही साधारण सी थी. मैं उसकी सूक्ष्म प्रतिक्रिया को एक इशारा मान कर चल रहा था और इसके साथ अपने तरीके से एक प्रयोग करके देखना चाहता था. चाहे यह कुछ बेवकूफ़काना ज़रूर लग सकता था मगर मेरी योजना से मुझे वो सुई मिल सकती थी जो मैं उस घास फूस के भारी ढेर से ढूँढ रहा था
जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ हमारे रात्रि विदा के चुंबन हमेशा सूखे, हल्के से और नमालूम होने वाले होंठो का होंठो से स्पर्श मात्र होते थे. अगर–मैं खुद से दोहराता जा रहा था—-अगर वो इतने सूखे ना रहें तो? मैं अपने होंठ उसके होंठो पर दबा तो नही सकता था क्योंकि वो मर्यादा के खिलाफ होता लेकिन अगर मेरे होंठ सूखे ना रहें तो? अगर उसको होंठो पर मुखरस का एहसास होगा तो? तब उसकी प्रतिकिरया क्या होगी? क्या वो इसका ज्वाब देगी?!
जितना ज़्यादा मैं अपनी योजना को व्यावहारिक रूप देने के बारे में सोचता रहा उतना ही ज़्यादा मैं आंदोलित होता गया. मेरी हालत एसी थी कि उस रात मैं सो भी ना सका, बस उससे पॉज़िटिव रियेक्शन मिलने के बारे में सोचता रहा.
अगली रात मैं प्लान के मुताबिक टीवी के आगे था. वो आई, जैसी मैं उम्मीद लगाए बैठा था कि वो आएगी और मुझे वहाँ मोजूद देखकर शायद थोड़ी एग्ज़ाइटेड होगी. मगर वो चेहरे से कुछ भी एग्ज़ाइट्मेंट या खुशी दिखा नही रही थी, इससे मुझे निराशा हुई और अपनी योजना को लेकर मैं फिर से सोचने लगा कि मुझे वो करना चाहिए या नही मगर निराश होने के बावजूद मैने प्लान को अमल में लाने का फ़ैसला किया. हमेशा की तरह हम कुछ समय तक टीवी देखते रहे, अंत मैं वो बोली, “मुझे सोना चाहिए बेटा! रात बहुत हो गयी है”
” ओके” मैने जबाब दिया और अपने सूखे होंठो पर जल्दी से जीभ फेरी.
वो मेरी ओर नही देख रही थी जब मैने अपने होंठो पर जीभ फेरी. मैने फिर से चार पाँच वार ऐसे ही किया ताकि होंठ अच्छे से गीले हो जाएँ. मैं होंठो से लार नही टपकाना चाहता था मगर उन्हे इतना गीला कर लेना चाहता था कि वो उस गीलेपन को, मेरे रस को महसूस कर सके. उसके बाद मैने खुद को उसकी प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लिया.
मेरा दिल बड़े ज़ोरों से धड़कने लगा जब वो मेरे सोफे की ओर आई. मैं थोड़ा सा आगे जो झुक गया ताकि उसको मेरे होंठों तक पहुँचने में आसानी हो सके. मैं खुद को संयत करने के लिए मुख से साँस लेने लगा जिसके फलसरूप मेरे होंठ कुछ सूख गये. मैने जल्दी जल्दी जीभ निकाल होंठो पर फेरी ताक़ि उन्हे फिर से गीला कर सकूँ बिल्कुल उसके चुंबन से पहले, मुझे नही मालूम उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था या नही.
जब माँ के होंठ मेरे होंठो से छुए तो मेरी आँख बंद हो गयी. मेरा चेहरा आवेश में जलते हुए लाल हो गया था. मुझे अपनी साँस रोकनी पड़ी, क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरी भारी हो चुकी साँस उसके चेहरे पर इतने ज़ोर से टकराए.
होंठो के गीले होने से चुंबन की सनसनाहट बढ़ गयी थी. यह वो पहले वाला आम सा, लगभग ना मालूम चलने वाला होंठो का स्पर्श नही था. आज मैं हमारे होंठो के स्पर्श को भली भाँति महसूस कर सकता था, और मुझे यकीन था उसने भी इसे महसूस किया था.
वो धीरे से ‘गुडनाइट’ फुसफुसाई और अपने रूम में जाने के लिए मूड गयी. उसकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नही आई थी हालाँकि मुझे यकीन था वो अपने होंठो पर मेरा मुखरस लेकर गयी थी. कुछ भी ऐसा असाधारण नही था जिस पर मैं उंगली रख सकता. ऐसा लगता था जैसे हमारा वो चुंबन उसके लिए बाकी दिनो जैसा ही आम चुंबन था. कुछ भी फरक नही था. मैं उसे अलग बनाना चाहता था, और उम्मीद लगाए बैठा था कि उसका ध्यान उस अंतर की ओर जाएगा मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ. अब निराश होने की बारी मेरी थी. जितना मैं पहले आवेशित था अब उतना ही हताश हो गया था.
मैने किसी सकरात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया की आशा की थी. अपने बेड पे लेटा हुआ मैं उस रात बहुत थका हुआ, जज़्बाती तौर पर निराश और हताश था. मैं किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया को आसानी से स्वीकार कर लेता मगर कोई भी प्रतिक्रिया ना मिलने की स्थिति के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नही था. उस रात जब मैं नींद के लिए बेड पर करवटें बदल रहा था, तो मेरा ध्यान अपने लंड पर गया जो मेरे जोश से थोड़ा आकड़ा हुया था इसके बावजूद कि बाद में मुझे निराशा हाथ लगी थी.
मेरी निराशा अगले दिन भी मेरे साथ रही. निराशा के साथ साथ आत्मग्लानी और शरम का एहसास हो रहा था. जो मैने किया था वो समाज, कुदरत, मान मरियादा के खिलाफ था इसलिए मेरे मन में ऐसा करने के लिए पछतावे का एहसास भी हो रहा था. अगली रात जब हमारे ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखने का टाइम हो गया तो मैं लगभग नही जाने वाला था. मैं शायद अपने कमरे मे ही रुकता मगर ये बात कि मेरे नजानें से वो मेरे रूम में आ सकती है मैने टीवी रूम जाने मे ही भलाई समझी. अब मैने जो धुन बनाई थी, उसका सामना करने का वक़्त था.
उसके व्यवहार में कोई भी बदलाव दिखाई नही दे रहा था जो शायद एक अच्छी बात थी. उसकी कोई भी प्रतिक्रिया ना देख मुझे बड़ी राहत हुई थी नाकी पिछली रात की तरह जब उसकी कोई भी प्रतिक्रिया ना देख मैं निराश हो गया था. मुझे एहसास हुआ कि हमारी दिनचर्या मे किसी तब्दीली के लिए मैं अभी तैयार नही था. मैने अचानक महसूस किया कि रात को माँ के साथ इकट्ठे समय बिताने से मुझे भी खुशी मिलती है. इस साथ से माँ के द्वारा मेरी भी एक ज़रूरत पूरी होती थी चाहे मनोवैग्यानिक तौर पर ही सही.
मैने हमारे चुंबन मे थोड़ा सा बदलाव कर उनको थोड़ा ठोस बनाने की कोशिश की थी और मैं ऐसा बिना कोई संकेत दिए या बिना कुछ जताए करने में सफल रहा था. मेरी शरम और आत्मग्लानि धीरे धीरे इस राहत से गायब होने लगी कि मैं बिना कोई कीमत चुकाए या बिना कोई सज़ा पाए सॉफ बच निकला था.
हालाँकि मेरे वार्ताव में तब्दीली आ गयी थी. मेरा उसको देखने का नज़रिया बदल गया था. उसे देखते हुए मुझे अब उतनी बैचैनि महसूस नही हो रही थी. मैने एक कदम और आगे बढ़ा दिया था और उसने मुझे ना कोसा था था ना ही कोई आपत्ति जताई थी. उस रात माँ को निहारने में मुझे एक अलग ही आनंद प्राप्त हो रहा था. यह बात जुदा थी कि मैं यकीन से नही कह सकता था कि जो कुछ हुआ था उसे उसकी कोई भनक भी लगी थी.