ये कैसी दूरियाँ( एक प्रेमकहानी )
कुछ हो ना हो पर रिश्तों को निभाने के लिए जिन्दगी में प्यार होना ज़रूरी है। पर क्या सच में? अगर ऐसा है तो फिर आज प्यार से जोड़े गये रिश्ते क्यों टूटते हैं?क्यों अधिकतर लोग नयी उम्र में जिससे प्यार करते हैं, शादी के बाद उससे रिश्ता तोड़ लेते हैं? सच तो ये है कि हमने रिश्तों को निभाने में ज़रूरी भरोसे को खोया। प्यार करना तो हमने फिल्म देखकर सीख लिया पर प्यार के लिए ज़रूरी भरोसा करना,हम नही सीख पाए।
ये कैसी दूरियाँ एक ऐसी लड़की की कहानी है,जिसे इस दुनिया की कोई समझ नही होती है। हालात कुछ ऐसे होते हैं कि उसे अपना घर छोड़ना पड़ता है । घर छोड़ने के बाद उसकी जिंदगी में ना जाने कितने मोड़ आते है। उस इंसान ने उसे समझा जिससे उसका कोई रिश्ता नही था और उसके अपने माँ-बाप उसे नही समझ सके। किसी के भरोसे के सहारे वो सम्भल तो गयी, पर कितनी ही बार उसे अपनों और गैरों से दिए ज़ख़्मों को सहना पड़ा।
बहुत देर से वो सड़क के किनारे खड़ी किसी रिक्शे का इंतज़ार कर रही थी , पर उधर से कोई भी रिक्शा नही गुज़रा। अंधेरा भी थोड़ा थोड़ा होने लगा था । उसने अब लिफ्ट माँगनी शुरू कर दी,लेकिन उसे डर भी लग रहा था। इससे पहले वो कभी भी इतनी देर तक बाहर नही रही थी और ना ही कभी उसने किसी से लिफ्ट ली थी , पर उसके पास कोई रास्ता भी नही था। तभी एक गाड़ी उसके पास आकर रुकी ,कोई 19-20 साल का लड़का था।
“आप मुझे राजापुर तक छोड़ सकते हैं ,”शीतल ने कहा।
उस लड़के ने कुछ नही कहा और बैठने का इशारा किया। शीतल को ये लड़का थोड़ा अजीब लगा। उसने जिस तरह से उससे बैठने का इशारा किया जिस तरह से वो उसे देख रहा था, ये सब उसे अजीब लग रहा था। उस लड़के के लिए जैसे शीतल कुछ थी ही नही। इतनी सुंदर लड़की को देखकर आम-तौर पर जैसा व्यवहार उसने लड़कों का देखा था वो उन सब से अलग था,वो बिल्कुल शांत और खुद में खोया हुआ था। उसने शीतल को उसकी बताई जगह पर छोड़ दिया। जैसे ही वो चलने को हुआ की शीतल बोली-“थैंक्स ,अपना नाम तो बता दो। “
“राज,”इतना कह कर वो वहाँ से चला गया।
पूरी रात वो सिर्फ उस लड़के के बारे में सोचती रही। सुबह उठी तो उसने देखा की उसकी माँ घर की सफाई कर रही थी।
“मम्मी,आज कुछ है क्या?”शीतल ने पूछा।
“नही बेटा,आज कोई आने वाला है,”उसकी माँ ने जवाब में कहा।
“कौन मम्मी ?”
उसकी माँ ने कुछ भी नही कहा। उसने फिर पूछा पर कोई जवाब नही मिलता। वो कॉलेज के लिए तैयार होने लगी।
“बेटा आज कॉलेज मत जाओ,”उसकी माँ ने कहा।
“क्यों मम्मी?”
“बस, ऐसे ही।”
शीतल नहीं मानती वो कॉलेज चली गयी। शीतल को बाहर घूमने का बहुत शौक था इसलिए वो हर रोज़ कॉलेज से लौटते समय अपने दोस्तों के साथ किसी पार्क या फिर रेस्टौरेंट जाती थी। उस दिन पार्क में उसे राज मिला,वो तुरंत उसके पास गयी और उससे बात करने लगी। राज को भी वो ठीक लगी इसलिए उन दोनों में जल्द ही दोस्ती हो गयी। वो अक्सर मिलने लगे थे। शीतल को राज की बातों से बहुत हिम्मत मिलती थी पर राज बात बहुत कम करता था और शीतल बहुत ज़्यादा। उनकी मुलाक़ातें ज़्यादा नही हुई थी वो सिर्फ़ 4-5 बार ही मिले थे।
उस दिन शीतल के घर उसकी बुआ शीतल के लिए शादी का रिश्ता लेकर आई थी। लड़का शीतल से 12 साल बड़ा था,वो 19 की थी और वो 31 का। शीतल का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और इस लड़के का परिवार आर्थिक रूप से बहुत मजबूत था। शीतल को अपनी बड़ी बहन के साथ जो हुआ था वो जब भी याद आता था तो शादी के नाम से भी चिढ़ने लगती थी। वो अपनी माँ से कहती थी कि मम्मी,मुझे शादी नही करनी है और तब तक तो बिल्कुल नही जब तक कि मैं कुछ बन ना जाऊँ। शीतल की बड़ी बहन को उसके ससुराल वाले बहुत परेशन करते थे वो अक्सर दहेज की माँग करते थे और अपनी माँग पूरी ना होने पर वो उसे मारते थे,तंग आकर उसने अपने को आग लगाकर जला लिया था। उसकी मौत के बाद से शीतल के अंदर एक डर बैठ गया था। उसे लगता था की उसके साथ भी ऐसा ही किया जाएगा।
कई दिन बाद जब उसकी मुलाकात राज से हुई तो उसने राज से कहा-“राज,क्या तुम मुझसे शादी करोगे?क्या मैं तुम पर भरोसा करके अपना घर छोड़ सकती हूँ?”
“आप पागल तो नही हो,हम अभी सिर्फ़ 5-6 बार ही मिले हैं और आप शादी की बात कर रही हो। मैं आप से प्यार नही करता,और मेरे लिए आप अपना घर मत छोड़िए। मुझे आप से कोई मतलब नही है , मैं सिर्फ़ आप से ऐसे ही बोल देता हूँ , बस। आप भी अपना घर कभी भी मत छोड़िएगा बाहर की दुनिया में जीना इतना आसान नही है। आपके लिए क्या,मैं अपने माँ-बाप को दुनिया की किसी भी लड़की के नही छोड़ सकता ना ही उनके खिलाफ जा सकता हूँ,किसी के साथ बिताये 20 दिन के लिए मैं अपने माँ-बाप का दिल नही दुखा सकता हूँ। अगर आप को कोई समस्या हो तो आप मुझ पर भरोसा कर सकती हैं । उस समय मैं आपका साथ दूँगा,पर ऐसे-वैसे किसी भी कदम में नही दे सकता हूँ……………। ग़लत के खिलाफ खड़े होना सीखीए,ग़लत करना नही।”
शीतल बिल्कुल शांत हो गयी । उससे कुछ भी नही बोला जा रहा था। फिर भी वो बहुत हिम्मत करके बोली-“प्यार तो मैं भी तुमसे नही करती हूँ,बस ये जानना चाहती थी की कहीं तुम तो मुझसे प्यार नही करते हो। मैं बस तुम्हारी अपने प्रति सोच जानना चाहती थी और कुछ नही , इतनी पागल मैं नही हूँ की 5 मुलाकात में किसी को दिल दे बैंठू। मुझे तो डर था कहीं तुम तो मुझे लेकर कोई सपना नही देखने लगे हो।”
कुछ देर बाद दोनो वहाँ से चले जाते हैं। दो दिन बाद शीतल को देखने के लिए फिर से वो लोग आए। वो लोग शीतल को ऐसे देख रहे थे जैसे वो शादी के लिए नही बल्कि इंटरव्यू लेने आयें हों। वो लड़का मुँह में पान दबाए हुए था और शीतल को ऐसे घूर रहा था जैसे कभी कोई लड़की नही देखी हो,शीतल को बहुत गुस्सा आ रहा था,तभी उसकी माँ ने उसे चाय लाने के लिए कहा। जब वो चाय लेकर आई तो उससे उस लड़के ने अपने बगल में बैठने का इशारा किया पर शीतल वहाँ से जाने लगी।
“रुकिये , मुझे आप से कुछ बात करनी है,”उसने शीतल को रोकते हुए कहा।
शीतल रुक जाती है, तो उसने उससे अकेले में बात करने की बात कही,शीतल ना चाहते हुए भी सब के कहने पर उससे बात करने के लिए तैयार हो गयी।
“ तुम इतनी सुंदर हो,तुम्हारे पीछे लड़के तो ज़रूर पड़े होंगे,”उसने पूछा।
“हाँ,बहुत पीछे पड़े रहते थे पर मैं इन सब पर ध्यान नही देती,”शीतल ने कहा।
“तुम्हारा किसी के साथ कोई चक्कर नही है।”
“नही,प्लीज़ आप मुझसे कुछ और बात करिये………………मुझे इस तरह की कोई बात नही पसंद है।”
“किसी लड़के से कोई रिश्ता तो नही है तुम्हारा………।”
“मतलब……? मुझे कुछ समझ नही आया।”
“किसी लड़के के साथ कभी कुछ किया………………खुद समझ सकती हो।”
“मैंने कहा ना मैं ऐसी लड़की नही हूँ …………। अभी हमारी शादी नही हुई है जो आप मुझसे ऐसे सवाल पूछ रहे हैं,”शीतल ने कहा।
“फिर भी इतनी ज़्यादा सुंदर हो कोई तो होगा………,”उसने कहा।
“आप यहाँ से तुरन्त चले जाईए और हो सके तो पहले किसी लड़की से बात करने की तमीज़ सीख लीजिए,”शीतल ने कहा और तुरन्त अपनी माँ के पास आई,बोली-“मम्मी,इन सब को तुरन्त यहाँ से जाने को कह दो।”
और उसने उनको घर से भगा दिया। उनके जाने के बाद सब शीतल को डाँटने लगे कि उसने उन्हें इस तरह से क्यों भगा दिया अगर उसे शादी नही करनी थी तो वो बाद में भी मना कर सकती थी।
उस दिन ज़िंदगी को कुछ और ही मंजूर था,तभी तो हमेशा शीतल का पक्ष लेने वाली उसकी माँ भी उसके खिलाफ थी और शीतल भी लड़ने को तैयार थी।
“मम्मी,वो बहुत बुरा है और मुझे अभी शादी भी नही करनी है। मैं आपकी बात मान लूँगी पर मुझे कुछ वक्त चाहिए। मैं कुछ बन जाऊँ तो आप किसी से भी कर देना पर अभी नही।”
“हम और इंतज़ार नही कर सकते,तुम्हारे बाद तुम्हारी छोटी बहन भी है और हम में दहेज देने की क्षमता नही है,जो हम तुम्हारे लिए अच्छे रिश्ते ढूँढ सके और अभी जो भी रिश्ते आ रहे वो उम्र बढ़ने पर नही आएँगे,”शीतल के पापा ने कहा।
“पापा,क्या मैं किसी शराबी से शादी करके अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर लूँ। इसी लिए आप ने मुझे इतना पढ़ाया है,”शीतल ने कहा।
शीतल की माँ कुछ कहने ही वाली थी की उसकी बुआ बोली-“शीतल तुम एक लड़की हो और तुम्हे इतना नही बोलना चाहिए,क्या हुआ अगर तुम उससे शादी कर लेती हो। तुमने अब तक बहुत पढ़ लिया अब जैसा हम कह रहे हैं तुम वैसा ही करोगी। क्या हुआ अगर वो थोड़ी शराब पीता है। ”
“बुआ आप मुझ से कुछ ना कहिए वैसे भी मेरे मम्मी-पापा को आपने ही शादी के लिए तैयार किया है,कल तक तो वो शादी की बात भी नही करते थे……। अच्छा होगा की आप अपने घर चली जाएँ,”शीतल ने कहा।
“तुम तय करोगी की कौन रहेगा और कौन नही,जाना है तो तुम इस घर को छोड़ कर चली जाओ हम सब से कह देंगे की तुम पढ़ने गयी हो। कोई बदनामी नही होगी हमारी,”शीतल की माँ ने गुस्से से कहा।
शीतल कुछ नही बोली उसकी आँखों आँसू से बहने लगे,वो कुछ समझ ही नही पा रही थी की ये सब क्या हो रहा था। उसे कोई भी नही समझ रहा था। तभी उसकी बुआ बोली-“क्या हुआ शीतल चुप क्यों हो,अब कुछ नही कहना। ”
शीतल को उनकी बात बहुत बुरी लगी,वो सीधे अपने कमरे में गयी अपनी मार्कशीट और सर्टिफिकेट्स लेकर घर से जाने लगी,उसे उम्मीद थी की कोई ना कोई उसे रोक लेगा पर किसी ने नही रोका।
“बेटी,घर चाहे जैसा भी हो पर बाहर की दुनिया से बहुत अच्छा होता है, “ उसकी माँ ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली वो चुपचाप घर छोड़ कर चली गयी। घर तो छोड़ दिया पर अब वो जाए तो कहाँ जाए,वो कुछ भी नही समझ पा रही थी। उसने बाहर की दुनिया भी इतनी नही देखी थी, पढ़ने में तो अच्छी थी पर दुनिया की समझ अभी उसे नही थी,वो सुंदर भी बहुत ज़्यादा थी, ऐसे में उसे और भी डर लग रहा था।
वो वहीं पार्क में चली गई,जहाँ उसे कई बार राज मिला था। इस आश में की शायद राज मिल जाए और हुआ भी ऐसा ही राज वहीं था। शीतल राज के पास गयी।
“राज,मैंने अपना घर छोड़ दिया है क्या तुम मेरी कोई मदद कर सकते हो?” उसने राज से कहा।
“नहीं,मैं कोई मदद नही कर सकता हूँ,”राज ने कहा।
“क्यों?”
“मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था की मैं तुमसे प्यार नही करता फिर तुमने मेरे लिए घर क्यों छोड़ा।”
‘मैंने तुम्हारे लिए नही छोड़ा,कोई बात हो गयी थी इसलिए।”
“मेरे पास क्यों आई हो…………। और अच्छा होगा की तुम अपने घर वापस लौट जाओ,हो सकता है की कोई बड़ी बात हो पर घर से अच्छा कुछ नही होता।”
शीतल,राज के सामने रोने लगी वो रोते हुए बोली-“मैं अब घर नही जा सकती मैं तुम्हारे भरोसे हूँ प्लीज़ मेरी मदद करो। ”
शीतल ने राज को एक गहरी सोच में डुबो दिया था। वो चाहकर भी उसकी कोई मदद नही कर सकता था,उसने खुद दुनिया नही देखी थी।
“मुझे माफ़ करना मैं तुम्हारी कोई मदद नही कर सकता,मैं तुम्हे लेकर कहाँ जाऊँगा?” राज ने कहा।
“मुझे कहीं भी ले चलो,अगर कोई जगह ना हो तो मुझे ले जाकर बेच दो या फिर मेरे साथ तुम कुछ भी करो मैं कुछ नही कहूँगी,ज़िंदगी तो बर्बाद होगी ही क्यों ना तुम ही कर दो,” शीतल ने राज की ओर देखे बिना कहा।
राज कुछ नही बोला वो उसे देखता ही रह गया,एक लड़की अपने को बेचने की बात कैसे कर सकती है ? लड़किया तो इससे बेहतर मरना पसंद करती हैं और ये ऐसी बात कर रही है।
“क्या हुआ ? कुछ बोल क्यों नही रहे हो, मदद नही कर सकते हो तो कुछ ग़लत ही कर दो,कुछ तो करने की हिम्मत जुटा लो ग़लत या मदद।”
राज फिर भी कुछ नही बोला वो शीतल का चेहरा ही देखता रह गया,उसकी आँखो से आँसू बहे जा रहे थे,उसके मासूम से चेहरे को देखकर कोई भी पिघल सकता था। राज अपनी बाइक लाया और उसे बैठने का इशारा किया,शीतल बिना सोचे समझे तुरंत बैठ गयी। राज उसे अपने घर ले गया,घर पहुँच कर उसने शीतल को बाहर ही खड़े रहने को कहा और खुद अंदर चला गया। उसने अपनी माँ को सारी बात बताई और कहा कि मम्मी उसे कुछ दिन के लिए यहाँ रहने दो,एक दो दिन में वो खुद चली जाएगी।
उसकी माँ नही मानी बोली-“मैं किसी घर से भागी हुई लड़की को अपने घर में नही रख सकती। ”
“मम्मी,वो ऐसी लड़की नही है जैसा आप समझ रही हैं,”राज ने कहा।
“क्या तुम उससे प्यार करते हो और शादी करना चाहते हो?”उसकी माँ ने पूछा।
“नही,मैं उससे सिर्फ़ 4—5 बार ही मिला हूँ,”राज ने कहा।
“उससे कह दो की यहाँ से चली जाए,वो यहाँ नही रह सकती,”उसके पापा ने कहा।
“पर पापा वो कहाँ जाएगी,बाहर उसकी ज़िंदगी भी खराब हो सकती है,”राज ने कहा।
“कहीं भी जाए पर इस घर में उसके लिए कोई जगह नही है और तुम उसे यहाँ लेकर ही क्यों आए मुझे तो लगता है कि उसने तुम्हारे लिए ही घर छोड़ा है,” उसकी भाभी ने कहा।
“भाभी,ऐसा कुछ नही है मैं सिर्फ़ उसकी मदद करना चाहता हूँ और कुछ नही,”राज ने कहा।
“किसी की मदद करने के लिए तुम उसे घर उठा लाओगे,क्या ये घर कोई धर्मशाला है,”उसके पापा ने कहा।
“पापा बचपन से आप लोग ही दूसरों की मदद करना हमें सिखाते हैं और जब कोई किसी मदद करने की कोशिश करता है तो सबसे पहले उसके घरवाले ही उसके खिलाफ हो जाते हैं…………..। मैं उसे यहाँ से जाने को नही कह सकता वो मुझ पर भरोसा करती है और मैं उसका भरोसा नही तोड़ूँगा,”राज ने कहा।
“तो फिर ठीक है तुम भी ये घर छोड़ कर चले जा,”उसके पापा ने कहा।
“मैं घर से क्यों जाऊँ ? मुझे समझ है की बिना आप लोगों के मेरी कोई पहचान नही है।”
“अगर घर में रहना है तो तुम उस लड़की को जाने को कह दो,नही तो तुम भी घर छोड़ कर चले जाओ,”उसके पापा ने कहा।
“मैं उससे जाने को नही कह सकता ना ही मैं घर छोड़ कर जा रहा हूँ।”
“बेटा समझने की कोशिश करो लोग क्या कहेंगे,”उसकी माँ ने कहा।
“आप मुझे समझिए मम्मी,सिर्फ़ एक दो दिन की बात है कौन सा मैं उससे शादी करने को कह रहा हूँ,”राज ने कहा।
“हमें कुछ नही समझना है तुम उसे लेकर यहाँ से चले जाओ,”उसके पापा ने कहा।
राज थोड़ी देर सोचता रहा फिर अपने कमरे में गया और अपने सर्टिफिकेट्स लेकर घर से जाने लगा उसकी माँ ने रोकना चाहा पर कुछ सोच कर वो भी कुछ नही बोली। सबको उम्मीद थी की वो एक दो दिन में वापस आ जाएगा।
राज और शीतल पैदल ही वहाँ से चल दिए। शाम के 7 बज चुके थे,दोनो एक-दूसरे से कुछ भी नही बोल रहे थे उन दोनों के बीच खामोशी थी। शीतल को अफ़सोस था की उसकी वजह से किसी और की भी ज़िंदगी बर्बाद हो गयी। वो राज से कुछ बोलना चाहती थी पर राज को कोई बात नही करनी थी,वो चुप-चाप चला जा रहा था। उन दोनों ने रात रेलवे स्टेशन पर बिताने का फ़ैसला किया उन्हें स्टेशन पहुचते-पहुचते रात के 9 बज गये थे। दोनों बहुत ज़्यादा थक गये थे। शीतल के बालों की लटें पसीने की वजह से उसके गालों से चिपक गयीं थीं जो उसकी सुंदरता को और बढ़ा रहीं थी। इतनी अस्त-व्यस्त हालत में भी वो बहुत सुंदर लग रही थी। वहाँ पर भीड़ बहुत कम थी। दोनों एक बेंच पर बैठ गये। शीतल राज से सटकर बैठी लेकिन राज उससे थोड़ा दूर हट गया। शीतल,राज से बात करना चाहती थी लेकिन राज खामोश बैठा रहा। धीरे-धीरे भीड़ और कम होने लगी थी 5-6 लोग ही बचे थे वो भी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे। शीतल ने अपना हाथ राज के हाथ पर रख दिया,राज ने शीतल की ओर देखा और फिर अपने हाथ को हटा लिया,उसकी इस हरकत पर शीतल धीरे से मुस्कुरा दी।
“आपका कोई दोस्त नही है जिससे हमें कोई मदद मिल सके,”शीतल ने पूछा।
राज उसको कुछ देर तक देखता रहा और बिना कुछ कहे नज़रें हटा लीं। कुछ देर तक कोई कुछ नही बोला। रात के 11 बज गये थे दोनों को भूख भी लगी थी।
“मैं बाहर से कुछ खाने के लिए लेकर आता हूँ। इस प्लॅटफॉर्म पर तो कोई दुकान भी नही है,”राज ने कहा और वो वहाँ से चला गया।
शीतल वहीं बैठी रही थोड़ी देर में पूरा प्लॅटफॉर्म खाली हो गया उसे वहाँ कोई भी नही दिख रहा था।
शीतल को बहुत डर लग रहा था,उसे राज का इंतज़ार करते हुए 1 घंटे से ज़्यादा हो गया था। थोड़ी देर बाद उसे कोई आता हुआ दिखाई दिया । उसे लगा की राज है वो शीतल की ओर ही आ रहा था। तोड़ा पास आया तो शीतल को उसका चेहरा साफ दिखाई देने लगा,वो राज नही था वो शीतल के बगल आकर बैठ गया,शीतल दूसरी ओर देखने लगी।
“अकेली हो,”उस लड़के ने पूछा।
शीतल कुछ नही बोली।
वो शीतल से सटकर बैठ गया। शीतल तुरंत उठ खड़ी हुई और वहाँ से चलने लगी। उसने महसूस किया की वो भी उसके पीछे-पीछे आ रहा है,वो और तेज़ी से चलने लगी। डर के कारण उसने एक बार भी पीछे मुड़ कर नही देखा। उसे अहसास भी नही हुआ की वो स्टेशन से काफ़ी दूर आ गयी थी। जब मुङ कर पीछे देखा तो पाया की पीछे कोई नही था उसमें वापस लौटने की हिम्मत नही थी लेकिन राज के लिए वो वापस स्टेशन की ओर लौट गयी। स्टेशन पर कोई नही था वो फिर से उसी बेंच पर बैठ कर राज का इंतज़ार करने लगी। आधा घंटा हो गया लेकिन राज नही आया। शीतल उसी लड़के के बारे में सोच कर रोने लगी पर वहाँ ना कोई उसका रोने की आवाज़ सुनने वाला था ना , ही उसके आँसू पोछने वाला। थोड़ी देर में राज वापस आ गया,लेकिन उसने भी शीतल से कुछ नही कहा और खाना उसके सामने रख दिया। राज को देखकर शीतल कमजोर पड़ गयी उसका रोना और तेज हो गया,वो चाहती थी राज उसे चुप कराए उसे अपने कंधे का सहारा दे लेकिन राज ने ऐसा कुछ भी नही किया उसने तो उससे कुछ बोला ही नही। थोड़ी देर में शीतल खुद ही चुप हो गयी। उसने खाना खाया और वहीं सो गयी। सुबह जब उसकी आँख खुली तो उस स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। राज पहले से ही जाग रहा था।
“तुम हाथ-मुँह धुल लो,हमें कोर्ट चलना है,”राज ने कहा।
“कोर्ट किसलिए?”शीतल ने पूछा।
“चलो,बाद में बताएँगे,”राज ने कहा।
कोर्ट जाने के रास्ते में शीतल ने राज से कहा-“आपने मुझे बताया नही की हम कोर्ट क्यों जा रहे हैं।”
“शादी करने के लिए,”राज ने कहा।
“शादी…। ,आप मुझ से शादी करेंगे?”शीतल ने पूछा।
“हां,मैं तुम्हारे साथ इस तरह नही रह सकता,”राज ने कहा।
“पर आप तो कहते थे की आप 27-28 साल से पहले शादी नही करेंगे,”शीतल ने कहा।
“तब हालात कुछ और थे आज कुछ और,”राज ने कहा।
शीतल चुप हो गयी।
“तुम्हारे पास कुछ पैसे हैं?”राज ने पूछा।
“200 रुपये हैं,और आपके पास ?”
“500,तुम्हारे पास जो हैं वो मुझे दे दो।”
“शीतल ने पूरे रुपये राज को दे दिए।”
दोनो ने कोर्ट में शादी कर ली। जो रुपये थे उन लोगो के पास , वो भी खर्च हो गये थे। दोनों अब पति-पत्नी थे। दिन के 12 बज रहे थे और दोनों ने सुबह से कुछ भी नही खाया था।
“अभी हमें रहने के लिए कोई जगह ढूढ़नी है,”शीतल ने कहा।
“तुम अपने लिए कोई काम ढूँढ लो और मैं अपने लिए कोई काम ढूढ़ने जाता हूँ,”राज ने कहा।
“मैं किसी रूम का पता करती हूँ,काम तुम ढूढों………। मुझे भूख भी लगी है,”शीतल ने कहा।
“पैसे तो हैं नही………………… ये जो तुमने कान में बाली पहनी है सोने की है?”राज ने पूछा।
“हाँ,”शीतल ने कहा और अपनी बाली उतार कर दे दी। कुछ देर में राज उसे बेच कर 2000 रुपये ले आया। दोनो ने किसी होटल में खाना खाया और स्टेशन पर मिलने का तय कर दोनों अलग-अलग चल दिए।
शाम को दोनों वहीं उसी स्टेशन की उसी बेंच पर फिर से मिले।
“कोई काम मिला?”शीतल ने पूछा।
“हाँ,एक शॉप पर डाटा एंट्री करने का काम मिला है 1500 महीने पर,”राज ने कहा।
“अच्छा है! मुझे एक रूम का पता चला है,मैंने अभी देखा नही है,किराया 400 है और इससे सस्ता मिलना बहुत मुश्किल है,”शीतल ने कहा।
उन्होने उस रूम को किराए पर लिया 400 रुपये एड्वान्स में दे दिए। उनके पास अब 1300 रुपये बचे थे। कमरे की हालत बहुत खराब थी,उसे देख कर शीतल को बहुत अफ़सोस हो रहा था की उसने घर क्यों छोड़ा ? उसने कभी नही सोचा था की उसे शादी के बाद इस तरह से ऐसे घर में रहना होगा। उसने तो ये भी नही सोचा था की उसे इस तरह से शादी करनी पड़ेगी।
उस घर में एक ही कमरा था और उसी से जुड़ा बाथरूम जिसका दरवाजा खराब हालत में था। ना तो पानी की कोई व्यवस्था थी ना ही बिजली की।
“आप बाजार से झाड़ू ले आओ,”शीतल ने कहा।
“और कुछ लाना है,”राज ने पूछा।
“अभी सिर्फ़ झाड़ू लाओ,बाकी बाद में,”शीतल ने कहा।
राज एक घंटे बाद झाड़ू और थोड़ा खाना ले आया। दोनो ने खाना खाया। शीतल ने पूरे कमरे को अच्छे से साफ किया। उनके पास बिछाने के लिए भी कुछ नही था इसलिए वो ऐसे ही फर्श पर बैठ गये।
“तुमने घर क्यों छोड़ा था?”राज ने पूछा ।
“मेरा इरादा घर छोड़ने का नही था , मैं तो अपनी बुआ से नाराज़ थी। मैंने सोचा था की मैं अपनी किसी दोस्त के घर रुक जाऊँगी और जब बुआ घर से चली जाएँगी तभी घर जाऊँगी, पर पता नही कैसे मैं तुम्हारे पास चली आई? लेकिन आप ने मेरे लिए घर क्यों छोड़ दिया?”शीतल ने कहा।
“क्योंकि तुम बहुत ही मासूम और पागल हो और अगर मैं तुम्हारा साथ नही देता तो तुम कुछ भी कर सकती थी,किसी के साथ कहीं भी जा सकती थी। तुम ग़लत सही कुछ नही सोचती हो। तुमने मुझे खुद को इस तरह से सौंप दिया था जैसे की तुम कोई खिलौना हो,”राज ने कहा।
“सिर्फ़ मासूम हूँ,सुंदर नही हूँ,”शीतल ने मज़ाक में पूछा।
“बहुत ज़्यादा सुंदर हो,”राज ने कहा।
“शीतल हँस दी और हँसते-हँसते उसकी आँखें नम हो गयी , वो रोने लगी।”
“मैंने तुम्हारी भी जिंदगी बर्बाद कर दी,”शीतल ने कहा।
“नही……,तुम अपने आप को दोष मत दो इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नही है। और तुम ऐसा क्यों सोचती हो की हम बर्बाद हो गये हैं। अभी पूरी जिंदगी बाकी है कुछ तो करेंगे ही,”राज ने कहा।
शीतल ने अपना सिर राज के कंधे पर रख दिया और राज के एक हाथ को कसकर पकड़ लिया। राज ने कुछ नही कहा और शीतल इसी तरह रोती रही।
“शीतल…,मैंने तुम्हारे लिए अपना घर छोड़ा है,तुम मुझसे वादा करो की तुम कभी भी मुझे छोड़ कर नही जाओगी,”राज ने कहा।
“कभी नही, मैं आपका साथ कभी नही छोड़ूँगी,” शीतल ने कहा।
रात के 1 बज गये थे कुछ देर वो इसी तरह से बातें करते रहें और फिर शीतल उठी और अपना दुपट्टा फर्श पर बिछा दिया।
“आप इस दुपट्टे पर सो जाइए,”शीतल ने कहा।
तुम उस पर सो जाओ मैं ऐसे ही ठीक हूँ। राज ने कहा और वो फर्श पर ही सो गया,शीतल कुछ देर सोचती रही फिर वो उस दुपट्टे पर सो गयी।
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सुबह शीतल की नींद जल्दी खुल गयी,राज अभी भी सो रहा थ। वो राज के सिर पर हाथ फिराने लगी जिससे राज की नींद खुल गयी।
“ये क्या कर रही हो?”राज ने पूछा।
“कुछ नही……। आपको काम पर नही जाना है,”शीतल ने कहा।
“ऐसे ही जाऊँ,यहाँ तो पानी भी नही है,”राज ने कहा।
“यहाँ से थोड़ी दूरी पर एक नल है आप वहाँ हाथ-मुँह धुल लो………………। आप के पास जो रुपये हैं उनसे बाल्टी,मग और कुछ समान लेते आना,”शीतल ने कहा।
“रुपये तुम रख लो और जो समान खरीदना हो तुम खरीद लेना,मुझे आने में देर हो सकती है।”
एक घंटे बाद राज कम पर चला गया और थोड़ी देर बाद शीतल ने भी अपने कपड़ों से धूल साफ की और वो भी बाहर किसी काम की तलाश में चल दी दरवाजे पे ताला भी नही लगाया,ताला था भी तो नही जो लगाती ना ही कोई समान था जो चोरी हो जाता,सिवाय झाड़ू के।
शीतल शाम 7 बजे तक घर आ गयी लेकिन राज रात 10 बजे घर आया।
“आप बहुत देर से आए और आपने दिन में कुछ खाया था या……………,” शीतल ने पूछा।
“खाया था,ये 200 रुपये रख लो,”राज उसे रुपये पकड़ाते हुए कहा।
“पर आपको तो महीने के अन्त मे पेमेंट मिलनी थी ,फिर ये कैसे…?”
“मैंने एक जगह मज़दूरी भी की थी,और तुम बताओ?”राज ने पूछा।
“मैं कुछ बर्तन,बाल्टी ,मग और मोमबत्ती ले आई हूँ। काम भी बहुत जगह मिल रहा था पर लोग अच्छे नही मिल रहे थे,सब की नज़रें बहुत खराब थीं,”शीतल ने कहा।
“तो फिर,अच्छे लोगों का मिलना भी बहुत मुश्किल है।”
“मैंने एक कॉल सेंटर में बात की है , एक-दो दिन में वो बता देंगे,”शीतल ने कहा।
“अँग्रेज़ी अच्छी है क्या?”राज ने पूछा।
“हाँ,मैं सिटी टॉपर हूँ।”
“सच में।”
“हाँ।”
“तुमने कुछ खाया आज?” राज ने पूछा।
“हाँ,थोड़ा बहुत खाया था।”
कुछ रुककर शीतल फिर बोली-“मुझे अकेले डर लगता है। तुम थोड़ा जल्दी आया करो। ”
राज ने कुछ नही कहा और चुप-चाप फर्श पर सो गया। लेकिन शीतल नही सोई उसने कॉपी और पेन उठाया (जो उसने सुबह खरीदा था)और मोमबत्ती की रोशनी में कुछ लिखने लगी। कुछ देर तक वो इसी तरह कुछ लिखती रही फिर अपने दुपट्टे को बिछाकर सो गयी।
सुबह जब राज काम पर जाने लगा तो शीतल ने उसे कुछ रुपये देते हुए कहा-“तुम अपने लिए कपड़े खरीद लेना। ”
राज ने रुपये लिए और बिना कुछ कहे चला गया। शीतल को बहुत दुख होता था जब राज उसकी बात का जवाब नही देता था पर वो राज से कुछ नही कहती थी। वो सोचती थी की मैं इतनी सुंदर हूँ लेकिन राज को तो कोई फ़र्क ही नही पड़ता राज की जगह कोई और होता तो मेरे साथ पता नही क्या करता पर राज तो मुझे सही से देखता भी नही मुझसे दूर ही रहा करता ना तो मेरी किसी बात का जवाब देता है ना ही खुद कोई बात करता है। घर में कितनी खुश थी लेकिन अब तो शायद सिर्फ़ रोना ही है।
कुछ दिन में शीतल को भी कॉल सेंटर में जॉब मिल गयी,वो दिन भर काम करते और रात को पढ़ाई उन्होने अब कभी-कभी कॉलेज भी जाना शुरू कर दिया था। राज रात को देर से आता था और शीतल 8 बजे तक आ जाती थी। उन दोनों को एक दूसरे पर विश्वास तो था पर उनके बीच दूरियाँ बहुत बढ़ गयी थीं। शीतल का कोई ऐसा दिन नही जाता था जिस दिन वो रोती ना हो वो चाहती थी की राज उसके दुख को समझे लेकिन राज के पास शीतल के लिए वक्त नही था । शीतल रोती भी बहुत ज़्यादा थी। उन्हें घर छोड़े दो महीने हो गये थे अब हालात कुछ बेहतर थे लेकिन अब भी बहुत- सी चीज़ों की कमी थी। राज सुबह 7 से रात 10 बजे तक काम करता था और शीतल सुबह 8से रात 8बजे तक। इतना काम करने के बाद भी दोनों रात-रात भर जाग कर पढ़ाई करते थे।
“तुम कल छुट्टी ले लो,”शीतल ने कहा।
“क्यों?”
“मैं सोच रही थी की कल कहीं बाहर चलते। हर रोज़ इतनी मेहनत करते-करते मैं थक गयीं हूँ बाहर चलेंगे तो शायद थोड़ा मन हल्का हो जाए,”शीतल ने कहा।
“मेरे पास तुम्हारे फालतू कामों के लिए वक्त नही है और तुम जानती हो कि हमें रुपयों की कितनी ज़रूरत है फिर भी तुम इस तरह की बात कर रही हो,”राज ने कहा।
“पैसा ही सब कुछ नही होता। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, मुझ पर भी ध्यान दिया करो,” शीतल ने कहा।
“तो क्या करूँ,मैं तुम से प्यार नही करता ना ही मुझे तुमसे शादी करनी थी वो हालात ऐसे हो गये थे जो मुझे तुमसे शादी करनी पड़ी। तुम्हे जो करना हो वो करो रोना है तो रोओ,हँसना है तो हँसो,मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता,”राज ने कहा और घर से बाहर चला गया।
शीतल वहीं की वहीं खड़ी रही,उसके पैर वहीं जम गये,उसकी आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद उसने खुद ही अपने आँसू पोछे और तैयार होकर कॉल सेंटर चली गयी।
शाम को शीतल तो जल्दी आ गयी पर राज रोज़ की तरह देर से ही आया। शीतल उस समय पढ़ रही थी जब राज आया।
“आज कॉल सेंटर गयी थी?”राज ने पूछा।
“हाँ।”
“आज खाना क्या बनाया है?”राज ने फिर पूछा।
“कुछ नही।”
“राज कुछ नही बोला वो खुद ही खाना बनाने लगा।”
“मुझे चार दिन बाद लखनऊ जाना है,”शीतल ने कहा।
“किसलिए?”
“मेरा ssc का इंटरव्यू है,रिटन में मैं पास हो गयी हूँ,”शीतल ने कहा।
“अकेले चली जाओगी या फिर मुझे……?”
“आप भी साथ चलना।”
कुछ देर में राज ने खाना बना लिया,उसने अपना और शीतल का खाना एक प्लेट में लिया और शीतल के पास आकर बैठ गया।
“लो खाना खाओ,”राज ने कहा।
“मुझे नही खाना।”
“क्यों?”
“भूख नही है,”शीतल ने कहा।
“सुबह का गुस्सा अभी शांत नही हुआ,”राज ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली,किताब बंद करके रख दी और लेट गयी।
राज ने भी शीतल से कुछ नही कहा,उसने खाना खाया और वो लेट कर सो गया।
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4 दिन बाद शीतल का इंटरव्यू था इसलिए वो कॉल सेंटर की जॉब छोड़कर घर पर इंटरव्यू की तैयारी करने लगी।
शीतल इंटरव्यू में पास हो गयी और उसे गवर्नमेंट जॉब मिल गयी। शुरुआत में 7000 रुपये महीने की पेमेंट थी। शीतल को जॉब करते 1 महीने हो गये और उसे पहली पेमेंट मिल गयी।
“तुम अब जल्दी आया करो,”शीतल ने कहा।
“क्यों ?”
“मैं अकेले घर में बोर हो जाती हूँ और अब तो पैसों की भी कोई दिक्कत नही है,”शीतल ने कहा।
“कोशिश करूँगा,वैसे तुम्हारे ऑफिस में कितने लोग काम करते हैं?”राज ने पूछा।
“बहुत लोग काम करते हैं पर मेरी उम्र की लड़कियाँ दो-तीन ही हैं और सब बहुत सीनियर हैं। एक-दो बहुत गंदे हैं मुझे बहुत बुरी नज़र से देखते हैं,”शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला।
“तुम इतना कम क्यों बोलते हो?”शीतल ने पूछा।
“थोड़ी बड़ी हो जाओ,तुम में बचपना बहुत है,”राज ने कहा।
शीतल हँस दी पर कुछ बोली नही। बहुत दिन बाद राज ने उससे इतनी प्यार से बोला था। उन्हे घर छोड़े 5 महीने हो गये थे लेकिन उनके बीच अब भी उतनी दूरियाँ थी जितनी की पहले।
राज घर जल्दी आने लगा,दोनों 7 बजे तक घर आ जाते थे। साथ में खाना बनाते और साथ में खाते पर एक-दूसरे से बात बहुत कम करते थे।
“कल मेरे ऑफिस की छुट्टी है,कहीं बाहर चलें,”शीतल ने कहा।
“नही मेरा मन नही है,”राज ने कहा।
शीतल का मन उदास हो गया। वो गुस्से से बोली-“तुम्हारा मन ही कब करता?”
“मुझे अभी बहस नही करनी है,”राज ने कहा।
“पर मुझे अभी बात करनी है,”शीतल ने कहा और वो रोने लगी।
राज ने कुछ नही कहा।
“माना की हमने शादी किसी मजबूरी में की लेकिन की तो,मैं तुम्हारी पत्नी हूँ तुम मुझ पर ध्यान क्यों नही देते,”शीतल ने कहा।
“मैं कोई फर्ज़ नही निभा सकता,”राज ने कहा।
“तो मुझ से शादी क्यों की?क्यों मुझे अपने साथ ले आए?छोड़ देते मुझे वहीं अकेला……………। तुम मुझ से सिर्फ़ इसलिए दूर रहते हो ताकि तुम मुझसे प्यार ना करने लगो जैसे मैं……,” शीतल बोलते –बोलते बिल्कुल चुप हो गयी।
“शीतल , तुम बच्चों की तरह ज़िद क्यों करती हो?”राज ने कहा।
“मैं बच्ची ही हूँ , मुझ में बड़ों जैसी अक्ल नही है। मैंने एक ग़लती की घर छोड़ने की क्या उस के लिए मैं अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दूँ?” शीतल ने रोते हुए कहा।
“बाहर घूमने से क्या जिंदगी आबाद हो जाएगी?”राज ने कहा।
“आबाद नही पर मन तो हल्का हो जाएगा………………,इतने दिन से दिल पर जो बोझ है वो तो………………।” रोने की वजह से शीतल इसके आगे नही बोल सकी।
राज शीतल के पास आया और आँसू पोछे और उसे गले से लगा कर बच्चों की तरह चुप कराने लगा। राज ने पहली बार शीतल को इस तरह से छूआ था। शीतल कुछ नही बोली और कुछ देर में वो सो गयी।
सुबह शीतल राज से कुछ नही बोली। राज ही बोला “ कहीं चलना है।”
“नही,” शीतल ने कहा।
“सर्दी बहुत पड़ रही चलो कुछ सर्दी के कपड़े ले आते हैं,” राज ने कहा।
शीतल फिर भी कुछ नही बोली।
तुम कुछ बोल क्यों नही रही,बाद में कहोगी की मैं कुछ नही बोलता, राज ने कहा।
“तुम जाओ मेरी तबियत ठीक नही है,” शीतल ने कहा।
“क्या हुआ तुम्हें…………? झूठ बोल रही हो……………गुस्सा हो मुझसे।”
“कुछ नही हल्का बुखार है। तुम जाओ और मेरे लिए भी कपड़े लेते आना। मैं गुस्सा नही हूँ,” शीतल ने कहा और हल्का सा मुस्कुरा दी।
राज चला गया,शीतल दिन भर घर पर ही रही। रात के 8 बज गये थे लेकिन राज अभी तक नही आया था। शीतल उसका इंतज़ार करते-करते सो गयी। करीब 10 बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया शीतल ने दरवाजा खोला तो बाहर राज नही था कोई और था।
“ये राज का घर है,”उस आदमी ने पूछा।
“हाँ,पर आप कौन?”शीतल ने पूछा।
“राज मेरे यहाँ काम करता है। उसका एक्सिडेंट हो गया है,”उस आदमी ने कहा।
“क्या?किस हॉस्पिटल में एडमिट है वो?”शीतल ने पूछा।4.
वो आदमी उसे अपने साथ हॉस्पिटल ले गया। राज की हालत बहुत खराब थी,उसका सिर फट गया था और उसका पैर भी टूट गया था। शीतल , राज की हालत देखकर बहुत तेज रोने लगी,तभी उससे एक नर्स ने पूछा-“क्या आप उनकी पत्नी हैं। ?
“हाँ।” शीतल ने कहा।
“आप 4-5 लाख रुपयों की व्यवस्था कर लीजिए इनके ऑपरेशन के लिए,”नर्स ने कहा।
“ये बच तो जाएँगे,”शीतल ने पूछा।
“कुछ कहा नही जा सकता,बहुत ही कम उम्मीद है बचने की। डॉक्टर्स ऑपरेशन कर रहे हैं बस आप पैसों का इंतज़ाम कर लीजिए,” नर्स ने कहा।
शीतल को समझ नही आ रहा था की वो क्या करे कहाँ से पैसे लाए। उसने सोचा की अपने घर चली जाए लेकिन उसके माँ-पापा इतना रुपेया नही दे पाएँगे। अन्त में उसने राज के घर जाने के लिए सोचा।
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रात के 11 बज रहे थे और बाहर बहुत सर्दी थी,शीतल ने मात्र एक सलवार-सूट पहना था। वो ऐसे ही राज के घर की ओर चल दी हल्की–हल्की बूंदे भी गिर रही लेकिन शीतल को इन सब की परवाह नही थी। करीब 12 बजे वो राज के घर पहुँच गयी। उसने दरवाजा खटखटाया,दरवाजा उसकी भाभी ने खोला।
“भाभी,राज का एक्सिडेंट हो गया है,उनकी हालत बहुत नाज़ुक है। ऑपरेशन के लिए 4-5 लाख रुपये चाहिए,” उन्हें देखते ही शीतल बोली।
“कहीं और जाकर भीख माँगो यहाँ कुछ नही मिलेगा,” उसकी भाभी ने कहा और दरवाजा बंद कर लिया।
बारिश भी तेज होने लगी थी शीतल वहीं बाहर बारिश में भीगती खड़ी रही। उसने फिर दरवाजा खटखटाया। इस बार फिर दरवाजा उसकी भाभी ने खोला लेकिन इस बार घर के सभी लोग जाग गये थे।
“तुम गयी नही,”भाभी ने कहा।
“आपको जो कहना है वो बाद में कहिएगा । अभी आप मेरे साथ हॉस्पिटल चलिए,”शीतल ने कहा।
“राज तुम्हारे लिए घर छोड़ सकता है , तुम उसके लिए कुछ नही कर सकती,रुपयों की ज़रूरत है तो खुद को बेच दो। सुंदर हो,बहुत पैसे मिल जाएँगे,”राज के भाई ने कहा।
शीतल सिर झुकाए खड़ी रही । वो कुछ भी नही बोल सकी।
“तुम राज को छोड़ कर चली जाओ , हम राज का पूरा इलाज कराएँगे और उसे घर भी ले आएँगे,” राज के पापा ने कहा।
“पापा जी,मैंने उनसे शादी की है , मैं उन्हें नही छोड़ सकती। वो आपका बेटा है , आप को उसकी जिंदगी की कोई परवाह नही है,” शीतल ने कहा।
“हमें अपने बेटे की परवाह है लेकिन उससे ज़्यादा तुमसे नफ़रत है। हम उसे खो सकते हैं पर तुम्हे अपना नही सकते,” राज की माँ ने कहा।
“आप तो ऐसा ना कहिए अगर उनका इलाज अच्छे से नही हुआ तो वो मर जाएँगे। डॉक्टर ने कहा है कि उनका बच पाना बहुत मुश्किल है,” शीतल ने कहा।
“यहाँ भीख नही मिलेगी कहीं और जाओ ,” इतना कहकर राज के भाई ने दरवाजा बंद कर लिया।
शीतल वहीं बारिश में भीगती खड़ी रही। वो इंतज़ार करती रही की शायद कोई फिर से बाहर आए और उसकी मदद करे। उसे खड़े-खड़े 3 बज गये पर कोई भी बाहर नही आया। बारिश भी थम चुकी थी। शीतल का बदन ठंड से कांप रहा था।
अब और इंतज़ार करना बेकार था। वो वहाँ से चल दी पर हॉस्पिटल जाने की उसकी हिम्मत नही हुई वो ये सोच रही थी अगर राज ने ठीक होने के बाद पूछा कि क्या वो उसके घर मदद माँगने गयी थी तो वो क्या कहेगी,उसके घर में किसी को उसके मरने-जीने से कोई फ़र्क नही पड़ता है। वो सब उसे इतना प्यार नही करते हैं जितनी की मुझसे नफ़रत।
वो सुषमा के घर गयी,सुषमा उसी के साथ उसके ऑफिस में काम करती थी दोनों की जॉब एक साथ लगी थी। सुषमा उसे घर के अंदर ले गयी। उस समय सुबह के 4 बज रहे थे।
“क्या हुआ? तुम इतनी सुबह-सुबह यहाँ,राज से फिर से लड़ाई हुई,” सुषमा ने पूछा।
“नही।”
“तो फिर क्या हुआ और तुम्हारे कपड़े क्यों गीले हैं?”सुषमा ने पूछा।
“राज का एक्सिडेंट हो गया है,मुझे 4-5 लाख रुपयों की ज़रूरत है,”शीतल ने कहा।
“मेरे पास इतने रुपये नही हैं। मैं ऑफिस के और लोगों से कॉन्टेक्ट करती हूँ , शायद वो कुछ मदद कर सकें,” सुषमा ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली। सुषमा ने बारी-बारी ऑफिस के सभी लोगों को फोन किया लेकिन कोई भी पैसा देने को तैयार नही हुआ,अन्त में सुषमा ने अनुज सर को फोन किया , वो पैसा देने को तैयार हो गये पर वो पहले शीतल से बात करना चाहते थे।
अनुज सर शीतल के सीनियर थे। वो शीतल को बहुत बुरी नज़र से देखते थे,ये बात शीतल भी जानती थी पर आज उसके सामने मजबूरी थी उनसे मदद लेने की।
“शीतल तुम अपने कपड़े बदल लो,”सुषमा ने कहा।
शीतल ने कपड़े बदले और सुषमा के साथ अनुज सर से मिलने के लिए उनके घर गयी। उनके घर पर उनकी एक बेटी और बेटा था। बेटा छोटा था,बेटी शीतल की ही उम्र की थी। उन्होंने शीतल को रुपये दे दिए और शर्त रखी की अगर 1 साल में पूरे रुपये नही चुकाये तो उसे उनसे शादी करनी पड़ेगी। शीतल ने शर्त मान ली और रुपये लेकर हॉस्पिटल की ओर चल दी।
“तुमने ये शर्त क्यों मानी,शीतल?” सुषमा ने पूछा।
और कोई रास्ता भी तो नही था,”शीतल ने कहा।
“लेकिन तुम इतने रुपये 1 साल में कैसे चुकाओगी। इससे तो अच्छा था की तुम राज के घर वालों की बात मान लेती। इस तरह अपना सौदा ना करती,” सुषमा ने कहा।
“मैंने राज से वादा किया था कि मैं उसका साथ कभी नही छोड़ूँगी,” शीतल ने कहा।
“और जब तुम पैसे नही चुका पओगी , तब क्या होगा?राज भी तुम्हारा साथ छोड़ देगा,जब उसे इस बारे में पता चलेगा,” सुषमा ने कहा।
“मुझे नही चुकाना है,पैसा राज चुकाएगा,” शीतल ने कहा।
“कैसे?उसकी हालत देखी है उसे ठीक होने में 6-7 महीने लग जाएँगे,” सुषमा ने कहा।
“मुझे नही मालूम,कैसे?लेकिन पैसा राज चुका देगा,”शीतल ने कहा।
“तुम क्यों इस रिश्ते को बचाना चाहती हो जब तुम दोनो एक-दूसरे से प्यार ही नही करते हो,हर दिन तो तुम दोनों में लड़ाई होती है। तुम्हारे लिए अच्छा होगा की तुम राज के घर वालों की बात मान लो,”सुषमा ने कहा।
“राज मुझसे नही लड़ता, मैं ज़िद करती हूँ , मैं लड़ती हूँ। मैं उनका साथ नही छोड़ सकती चाहे मुझे कितने भी दुख सहने पड़े,” शीतल ने कहा।
सुषमा कुछ नही बोली। थोड़ी देर में हॉस्पिटल आ गया। शीतल ने फीस जमा की और वहीं बेंच पर बैठ गयी। उसके सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा था।
“आप ये इंजेक्शन और दवाइयाँ लेते आइए,” नर्स ने शीतल से कहा।
शीतल ने नर्स से पर्चा लिया और मेडिकल स्टोर चली गयी। वो ठीक से खड़ी भी नही हो पा रही थी फिर भी किसी तरह उसने दवाइयाँ ली और आकर नर्स को दी। अचानक उसे चक्कर आ गया और वो बेहोश होकर गिर गयी। रात को भीगने की वजह से उसकी तबियत खराब हो गयी थी। जब उसे होश आया तो वो भी हॉस्पिटल के एक बेड पर लेटी हुई थी। उसके बगल में सुषमा बैठी थी।
“शीतल,ये कुछ फल खा लो उसके बाद ये दवाइयाँ,” सुषमा ने उसे फल पकड़ाते हुए कहा।
“मैंने तुम्हारी छुट्टी के लिए अप्लिकेशन लगा दी है,” सुषमा ने फिर कहा।
थोड़ी देर रुकने के बाद सुषमा वहाँ से चली गयी। राज का एक्सिडेंट शीतल की जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव लाया। शीतल रात भर राज के पास बैठी रहती और सुबह ऑफिस जाती उसे इस बात का ध्यान ही नही रहता था की उसने सुबह से कुछ खाया है या नही,सुषमा के कहने पर थोड़ा बहुत खा लेती थी। एक तरफ राज की हालत में सुधार आ रहा था तो दूसरी ओर शीतल की तबियत खराब होती जा रही थी। उसने अपने उपर ध्यान देना छोड़ दिया था , उसे सिर्फ़ राज की ही चिंता थी। राज का एक्सिडेंट हुए 1 महीना हो गया था। इस एक महीने में शीतल ने बहुत कुछ सहा था। एक महीने में उसने खुद को बहुत ज़्यादा बदला,कभी छोटी-छोटी बात पर ज़िद करने वाली शीतल बहुत गंभीर हो गयी थी,रात को घर पर अकेले रहने से डर लगता था लेकिन अब वो रात को अकेले कहीं जाने से भी नही डरती थी। उसका बचपना कहीं खो गया था राज के एक्सिडेंट ने उसे बहुत बड़ा बना दिया था।
शीतल कई-कई दिन घर नही जाती थी। हॉस्पिटल से ऑफिस और ओफिसे से हॉस्पिटल यही उसकी दिनचर्या हो गयी थी। सुबह से उसका सिर बहुत तेज दर्द हो रहा था और उसे उल्टियाँ भी आ रही थी , इस वजह से वो ऑफिस नही गयी। शीतल ऑफिस नही गयी थी इसलिए सुषमा उससे मिलने हॉस्पिटल आ गयी।
“राज की हालत कैसी है?”सुषमा ने पूछा।
“ठीक है।”
“और तुम्हारी?” सुषमा ने फिर पूछा।
शीतल कुछ नही बोली।
“तुमने सुबह से कुछ खाया या नही।”
शीतल फिर कुछ नही बोली।
“शीतल,तुम अपनी हालत देख रही हो,मुझे तो लगता है की कहीं तुम ही ना मर जाओ……।”
“तुम अपना थोड़ा तो ख्याल रखो,कितनी सुंदर दिखती थी तुम और अब देखो अपने को……। आज तुम इतनी कमजोर हो गयी हो की ठीक से खड़ी भी नही हो पा रही हो,”सुषमा ने कहा।
“तो मैं क्या करूँ?मुझसे सब कुछ नही संभाला जाता,मैंने आज तक अकेले कुछ नही किया है और आज मुझे सब कुछ अकेले ही करना पड़ रहा है। मुझे किसी का सहारा चाहिए मैं अपना दर्द तो किसी से बाँट सकूँ। पहले राज तो था साथ में, अब कोई नही है,”शीतल ने कहा।
“तुम अपने घर क्यों नही चली जाती। हो सकता है कि उन्होनें तुम्हे माफ़ कर दिया हो,” सुषमा ने कहा।
“जब राज के घरवाले राज की इस हालत में भी उसका साथ नही दे रहे तो क्या मेरे मम्मी-पापा देंगे?मेरी किस्मत में सिर्फ़ रोना ही लिखा है। जब घर नही छोड़ा था तब भी रोयी,घर छोड़ने के बाद भी रोयी,राज के साथ भी रोयी और आज जब राज इस हालत में हैं तब भी रो रही हूँ,” शीतल ने कहा।
“ज़रूरी नही की सबकी सोच एक जैसी हो,हो सकता है की तुम्हारे घरवाले तुम्हारा साथ दें एक बार घर जा कर तो देखो,” सुषमा ने कहा।
“गयी थी एक बार जब मेरी जॉब लगी थी,घर पर प्रिया(शीतल की छोटी बहन) थी मैं उससे कुछ कहती उससे पहले वो मुझसे बोली-‘दीदी,आप यहाँ क्यों आई हो,मम्मी ने देख लिया तो वो मुझे बहुत डाटेंगी। मम्मी आपसे बहुत नफ़रत करती हैं , उन्होंने हमसे भी कहा है कि अगर हम आप से कभी मिले तो मुझसे भी रिश्ता तोड़ देंगी,उनके लिए आप मर चुकी हो………।‘ वो और कुछ कहती उससे पहले ही मैं बिना कुछ कहे लौट आयी,”शीतल ने कहा।
“तुमने कुछ भी ग़लत नही किया शीतल,वो तुम्हारी शादी 31साल के आदमी से करा रहे थे,ऐसे में तुम क्या करती,तुमने किसी के प्यार में पड़ कर,उनका दिल दुखा कर घर नही छोड़ा था बल्कि तुम्हारा दिल दुखा था,” सुषमा ने कहा।
“आज का मालूम नही लेकिन मेरी माँ मुझसे बहुत प्यार करती थी। वो मेरी शादी उससे कभी नही करती वो तो सिर्फ़ मुझे देखने आए थे और मम्मी ने जो कुछ भी कहा था उस समय गुस्से में कहा था मैं ही ज़िद कर बैठी थी,” शीतल ने कहा।
कुछ देर दोनों कुछ नही बोले। शीतल , सुषमा का सहारा लेकर खड़ी हुई और बोली-“मुझे मेरे घर छोड़ दो,सह लूँगी मम्मी की डाँट आख़िर कितनी देर गुस्सा रहेंगी। ”
सुषमा ने उसे अपनी स्कूटी से उसे उसके घर रात के 9 बजे तक छोड़ दिया और खुद वहाँ से तुरंत चली गयी। शीतल दरवाजा खट खटाने जा रही थी की अचानक एकदम से रुक गयी,घर के अंदर से उसकी मम्मी की आवाज़ आ रही थी। वो क्या कह रही थी ये साफ-साफ नही सुनायी पड़ रहा था। शीतल कुछ सोच कर वापस लौटने लगी। उसने दरवाजा नही खटखटाया,शीतल ठीक से चल भी नही पा रही थी,वो लड़खड़ाते हुए कदमों से चल रही थी। घर से कुछ दूर सड़क पर एक किनारे बैठ गयी और किसी गाड़ी का वहाँ से निकलने का इंतज़ार करने लगी। वो एक घंटे तक इंतज़ार करती रही पर वहाँ से कोई नही निकला । वो जहाँ थी वहाँ से रात के समय कोई नही निकलता था। उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था,दर्द और थकान के कारण उसे कब नींद आ गयी उसे पता भी नही चला।
सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसने खुद को बेड पर पाया। उसके आस-पास कोई नही था। वो एक कमरे में थी , कमरे से बाहर निकल कर उसने पूरा घर देख डाला पर उसे कोई कहीं नही दिखा । घर का दरवाजा बाहर से बंद था या फिर ताला लगा था। घर बहुत बड़ा और सुंदर था शायद वो किसी के बंगले में थी। वो अभी भी पूरी तरह से ठीक नही थी उसके सिर में अभी भी दर्द हो रहा था। शीतल हॉल में पड़े सोफे पर लेट गयी और किसी के आने का इंतज़ार करने लगी। उसे डर भी लग रहा था की कहीं कुछ बुरा …………कुछ देर बाद वो अचानक से बड़ी ही तेज़ी से खड़ी हुई और अपने-आप को अच्छी तरह से देखने लगी और बहुत ज़्यादा घबरा गयी,उसके कपड़े बदले हुए थे उसने किसी और के कपड़े पहन रखे थे। कहीं किसी ने उसके साथ कुछ किया तो नही या फिर किसी ने…। कोई लड़की थी या फिर कोई लड़का। तरह-तरह की बातें उसके मन में आने लगी वो जितना ज़्यादा सोचती उतना ही ज़्यादा डरने लगती। वो रोने लगी थोड़ी देर रोती रही फिर हॉल से उठकर वापस उसी कमरे में चली गयी और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
उस समय 10 बज रहे थे,वो फिर से बेड पर लेट गयी तभी उसकी नज़र वहीं बेड के बगल में रखी मेज पर गयी। उस पर एक पर्चा और कुछ दवाइयाँ रखी थी । उसने पर्चा उठाया और पढ़ने लगी। उसमें लिखा था – “ तुम्हारी तबीयत ठीक नही है इसलिए ये दवाइयाँ खा लेना और भूख लगे तो कुछ खा लेना।” उसे पढ़ कर शीतल में थोड़ी हिम्मत आई । उसे उम्मीद हुई की शायद कोई अच्छा………। उसने कल से कुछ नही खाया था भूख तो लगी ही थी,वो किचन में गयी वहाँ खाना रखा हुआ था, खाना ताज़ा था किसी ने सुबह ही बनाया था। शीतल ने खाना खाया और वापस कमरे में आकर दवाई खाई। वो थोड़ी देर के लिए लेट गयी लेकिन उसे नींद नही आ रही थी वो उठी और छत पर चली गयी। छत से दूर तक का नज़ारा दिखाई दे रहा था। वहाँ आस-पास कोई घर नही था , दूर-दूर तक कोई दिखाई भी नही दे रहा था । शायद वो किसी का फार्म हाउस था। शीतल को फिर से डर लगने लगा , आख़िर उसे कोई यहाँ क्यों लाया?अगर किसी ने उसकी मदद की थी वो उसे हॉस्पिटल या फिर पुलिस स्टेशन क्यों नही ले गया ? इस सूनसान जगह पर क्यों लाया? वो बड़ी देर तक सोचती रही,उसे डर भी था और एक उम्मीद भी की कोई अच्छा व्यक्ति हो तो। वो उसी कमरे में जाकर लेट गयी थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गयी और वो सो गयी। शाम को जब वो उठी तब भी कोई नही आया था। उसने फिर से कुछ खाया और हॉल में सोफे पर बैठ गयी,वो इंतज़ार कर रही थी किसी के आने का। करीब 9बजे दरवाजा खुला,कोई लड़का था 25-26 साल का उसके साथ और कोई नही था। शीतल उसे मूर्ति बनी देख रही थी,उसके पूरा शरीर कांप रहा था। वो लड़का अंदर आकर सोफे पर बैठ गया।
“आप कौन?” शीतल ने पूछा।
“ये मेरा ही घर है,” उस लड़के ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली,पूछना तो चाहती थी की आप ही मुझे यहाँ लाए थे लेकिन उससे कुछ भी नही कह पाई,वो उसे चोर निगाहों से देख रही थी। वो लड़का देखने में किसी हीरो से कम नही था।
“तुम्हारा नाम क्या है?” उस लड़के ने पूछा।
“शीतल…………और आपका?”
“जय,आप को कल मैं ही यहाँ लेकर आया था,आप मुझे सड़क के किनारे बेसुध पड़ी मिली थी,बारिश की वजह से आप पूरी तरह से भीगी हुई थीं,” उस लड़के ने कहा।
“पर कल बारिश नही हो रही थी,” शीतल ने कहा।
“हो सकता है आपके बेहोश होने के बाद हुई हो,” जय ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली वो असहज महसूस कर रही थी।
“तुम्हारे साथ हुआ क्या था ? तुम वहाँ बेहोश पड़ी थी,देख कर ऐसा तो नही लग रहा था की तुम्हारे साथ कुछ हुआ हो,”जय ने कहा।
“मेरी तबीयत खराब हो गयी थी,”शीतल ने कहा। कुछ रुककर फिर पूछा-“क्या आप मुझे वापस वहीं छोड़ सकते हैं?”
“अभी नही क्योंकि यहाँ से वो जगह लगभग 80किलोमीटर दूर है और यहाँ से शहर भी बहुत दूर है,” जय ने कहा।
“ठीक है………। आप यहाँ अकेले रहते हैं,” शीतल ने पूछा।
“नही,यहाँ कोई नही रहता , कभी-कभी मैं यहाँ आता हूँ। आपको डर लग रहा है क्या?जो आपने ऐसा पूछा,”जय ने कहा।
नही।
“बहुत सुंदर हो तुम,”जय ने शीतल की तारीफ करते हुए कहा।
“मालूम है,और मेरे बारे में सोचने की ज़रूरत नही है मैं शादीशुदा हूँ,” शीतल ने उसी लहजे में कहा।
“दिखती तो बहुत कम उम्र की हो। करती क्या हो?” जय ने पूछा।
“सिर्फ़ 20 की ही हूँ, बी.ए. कर रही हूँ और साथ ही सरकारी जॉब।”
“बहुत अच्छी।”
शीतल कुछ नही बोली।
“तुमने कुछ खाया था या……और अब तुम्हारी तबीयत कैसी है?जय ने पूछा।”
“खाया था और तबीयत भी ठीक है।”
“तुम जाकर सो जाओ रात बहुत हो गयी,” जय ने कहा और खुद वहाँ से उठ कर एक कमरे में चला गया। शीतल भी अपने कमरे में चली गयी और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसे लेटे थोड़ी ही देर हुई थी की जय ने दरवाजा खटखटाया। शीतल ने दरवाजा खोला तो जय तुरन्त कमरे के अंदर आ गया। शीतल को जय की ये हरकत बुरी लगी और थोडा डर भी लगा। जय बेड पर बैठ गया,उसने शीतल को अपने बगल बैठने का इशारा किया। शीतल बैठना तो नही चाहती लेकिन वो जय को मना भी नही कर पाई,वो बेड पर जय से थोड़ी दूरी बना कर बैठ गयी।
“क्या हुआ ? आप यहाँ क्यों आए हैं?” शीतल ने पूछा।
“मैं तुम्हारे लिए कुछ कपड़े लाया हूँ,” जय ने शीतल को कपड़े पकड़ाते हुए कहा।
जय उसके लिए ब्लैक सलवार-सूट और ब्लू जीन्स,रेड टॉप लाया था।
“मैं जीन्स नही पहनती और आपको मेरे लिए ये सब करने की ज़रूरत नही है,” शीतल ने कहा।
“जीन्स क्यों नही पहनती,अच्छी लगोगी,” जय ने कहा।
“मैं ब्लैक सूट में ज़्यादा अच्छी लगती हूँ,आपका लाया हुआ सूट मुझे ज़्यादा पसन्द है पर मैं जीन्स नही पहन सकती,” शीतल ने हँसते हुए कहा।
वो बहुत दिन बाद वो खुल कर हँसी थी । जो कुछ वो राज से चाहती थी वो उसे जय से मिल रहा था।
“एक बार जीन्स पहन कर तो देखो,”जय ने उससे थोड़ा ज़िद करते हुए कहा।
“आप मेरे कौन हो ? जो आपके लिए मैं ………,”शीतल ने कहा।
“कोई बात नही ना , पहनो जीन्स पर मुझे तो इस तरह पराया ना करो,” जय ने शीतल के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा।
शीतल हँस दी और अपना हाथ पीछे खींच लिया।
“तुम्हें तो अब भी बुखार है और तुम कह रही थी तुम ठीक हो,” जय ने कहा।
“बस हल्का-सा ही तो है,” शीतल ने बड़ी ही मासूमियत से बच्चों की तरह कहा।
जय उसके इस तरह से बोलने पर हँस दिया।
“अब तुम सो जाओ,मुझे तो अभी किसी का इंतज़ार करना है,” जय ने कहा और वो कमरे से बाहर हॉल में चला गया।
शीतल राज से 6 महीने में इतना नही खुली थी जितना वो जय से कुछ घंटों में खुल गयी थी। जय ठीक वैसा था जैसा पति वो चाहती थी। उसने सोचा की क्यों ना एक बार जीन्स ट्राई की जाए। वो कपड़े बदलने जा ही रही थी कि उसका ध्यान पहने हुए कपड़ों पर चला गया जो उसके थे ही नही, वो किसी और लड़की के थे। उसका चेहरा फिर से उतर गया क्या जय ने कल रात को उसके कपड़े बदले थे?वो चुपचाप लेट गयी उसकी सारी खुशी एक पल में चली गयी,वो तरह-तरह की बातें सोचने लगी,उसे समाज,राज सभी का डर सताने लगा,कहीं जय ने उसके साथ कुछ………। ऐसे सोचते-सोचते उसे नींद आ गयी और वो सो गयी । वो कमरे का दरवाजा बंद करना भी भूल गयी। आधी रात को उसके हाथों में कुछ चुभने से उसकी नींद खुली पर कमरे में अंधेरा था और नींद में भरे होने के कारण वो ठीक से देख भी नही पायी की कौन था। शायद उसे कोई इंजेक्शन लगा रहा था। वो ठीक से उठ भी नही पायी थी की इंजेक्शन की वजह से वो बेहोश हो गयी या फिर सो गयी।
सुबह उसकी आँख कुछ देर से खुली,करीब 9 बजे,उसके सिर में उस समय हल्का दर्द हो रहा था,वो उठी और अपने आस-पास अच्छी तरह से देखने लगी,उसे मेज पर इंजेक्शन पड़ा दिखा,वो इंजेक्शन किसी को लगाया जा चुका था। शीतल को समझ आ गया की कल रात उसे ये इंजेक्शन लगाया गया था। वो कमरे से निकल कर जय को ढूढ़ने लगी लेकिन जय घर में नही था,पूरे घर में देख लिया पर उसे जय कहीं नही दिखा ना ही कोई और। घर का दरवाजा खुला था,वो बाहर आई तो देखा जय गार्डेन में बैठा है उसके साथ 29-30 की एक लड़की एक बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। शीतल उनके पास गयी। वहाँ कुछ कुर्सी और एक मेज रखी थी।
“शीतल,ये मेरी बड़ी बहन ज्योति है और गोद में इनका 2साल का बेटा यश है,” जय ने शीतल का परिचय कराते हुए कहा।
“जय मुझे तुमसे कुछ पूछना है,” शीतल ने ज्योति से नमस्ते करते हुए कहा।
“पूछो।”
“कल रात मेरे कमरे में कौन आया था और मुझे इंजेक्शन क्यों और किसने लगाया था?” शीतल ने पूछा।
“मैं आई थी,मैंने ही इंजेक्शन लगाया था,” ज्योति ने कहा।
“क्यों?”
“तुम इतनी लापरवाह क्यों हो,इतनी ठंड में तुम बिना किसी गर्म कपड़े के बाहर आ गयी। तुम्हारी तबीयत ठीक नही है लेकिन तुम्हें इसकी कोई परवाह नही है,कल रात को भी तुमने कुछ ओढ़ नही रखा था तुम्हारी पूरी शरीर ठंड से कांप रही थी,”ज्योति ने कहा।
“मुझे इंजेक्शन किसलिए लगाया था?”शीतल ने अपना प्रश्न दोहराया।
“तुम्हें बहुत ज़्यादा बुखार था इसलिए मुझे इंजेक्शन लगाना पड़ा,मैं एक डॉक्टर हूँ, वो इंजेक्शन दवाई का था,”ज्योति ने कहा।
शीतल बिल्कुल चुप हो गयी उसके पास ज्योति की बात का कोई जवाब नही था,उसे कुछ पूछना था लेकिन वो कुछ भी नही कह पाई।
“उस रात को भी तुमने कोई गर्म कपड़े नही पहने थे,ऐसे सड़क के किनारे पड़ी थी। घर नही है क्या?उस रात मैंने तुम्हारे कपड़े बदले थे और मैंने तुम्हारा पूरा मेडिकल चेक-उप किया था किसी तरह का कोई भी चोट का निशान नही था ना ही तुम्हारे साथ कुछ ग़लत हुआ था। बेहोश होकर भी नही गिरी थी क्योंकि बेहोश होकर गिरती तो कुछ चोट ज़रूर होती। आख़िर हुआ क्या था?” ज्योति ने उससे एक बार में बहुत कुछ कह दिया।
शीतल ने कोई जवाब नही दिया,ज्योति की बातों से उसे तसल्ली हो गयी थी की वो यहाँ पूरी तरह से सुरक्षित है।
“रहती कहाँ हो?”ज्योति ने पूछा।
“प्रीतमपुर।”
“पढ़ती हो?” ज्योति ने पूछा।
“पढ़ती हूँ और जॉब भी करती हूँ,” शीतल ने कहा।
“उम्र क्या है?”ज्योति ने पूछा।
“20 साल।”
“शादीशुदा हो?” ज्योति ने पूछा।
“हाँ।”
“लव या अरेंज?” ज्योति ने पूछा।
“कोर्ट मैरिज,” शीतल ने कहा।
“इतनी जल्दी क्या थी शादी करने की घरवाले करते तो कुछ समझ आता है पर तुमने अपनी मर्ज़ी से की। क्या तुम पागल हो?देखने में बच्ची जैसी मासूम दिखती हो और हरकतें भी बच्ची जैसी हैं फिर क्यों इतनी जल्दी थी। थोड़ी और बड़ी हो जाती तभी शादी करती,” ज्योति ने कहा।
शीतल से कुछ बोलते नही बना। ज्योति तो उससे इस तरह से पेश आ रही थी जैसे की शीतल कोई आतंकवादी हो और वो सेना की अधिकारी। शीतल नज़रें झुकाए खड़ी थी वो उन्हें कैसे बताती की उसकी शादी किन हालत में हुई थी।
“शीतल तुमने जीन्स नही पहनी,” जय ने माहौल को हल्का करने के लिए मज़ाक में कहा।
शीतल हँस दी पर कुछ बोली नही,वो शर्मा गयी थी। उसने वहाँ से चले जाना ही बेहतर समझा और घर के अंदर चली गयी अपने कमरे में पहुँच कर उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। जय की बात उसके मन में चल रही थी,उसने सोचा क्यों ना एक बार जीन्स पहन ही लूँ,वो बेड पर लेटी यही सब सोच रही थी किसी ने दरवाजा खटखटाया,शीतल ने दरवाजा खोला,सामने ज्योति खड़ी थी।
“तुम नहा कर तैयार हो जाओ,” ज्योति ने कहा।
“क्यों दीदी?”
“तुम्हें तुम्हारे घर जाना है या नही,”ज्योति ने कहा।
“ठीक है,दीदी,” शीतल ने कहा पर तब तक ज्योति जा चुकी थी।
एक घंटे बाद शीतल अपने कमरे से बाहर हॉल में आई। उस समय ज्योति किचन में थी,हॉल में यश सोफे पर बैठा खिलौनों से खेल रहा था। शीतल भी यश के साथ खेलने लगी। तभी ज्योति किचन से निकल कर हॉल में आई।
“तुम कुछ खाओगी?” ज्योति ने पूछा।
“नही दीदी,मुझे मेरे घर छोड़ दीजिए,” शीतल ने कहा।
“जय बाहर गार्डेन में है,तुम उसके साथ चली जाओ,” ज्योति ने कहा।
शीतल बाहर गार्डेन में गयी,जय की नज़रें जब उस पर पड़ी तो उसकी नज़रें शीतल पर ही टिक गयी। शीतल ने रेड टॉप और ब्लू जीन्स पहनी थी।
“जय,मुझे घर छोड़ दो,” शीतल ने कहा।
“ठीक है,” जय ने उससे नज़रें बिना हटाए ही कहा।
शीतल बिना कुछ कहे वहीं थोड़ी ही दूरी पर खड़ी जय की गाड़ी में जा कर बैठ गयी। जय भी कुछ नही बोला और गाड़ी में बैठ गया। करीब 40 मिनट में हाइवे पर आ गये इस 40 मिनट में दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नही की।
“बहुत सुंदर दिख रही हो,” जय ने बिना शीतल की ओर देखे ही कहा।
शीतल कुछ नही बोली बस नीचे की ओर देखने लगी। उसे राज की याद आ र्ही थी। राज से वो क्या कहेगी,कहाँ थी वो 2दिन। राज की हालत इतनी तो सुधर गयी थी की वो बोल सकता था सिर्फ़ उसके पैर का फ्रैक्चर ठीक नही हुआ था। उसे रुपयों का इंतज़ाम भी करना था। शीतल की आँखों से कब आँसू बहने लगे उसे पता ही नही चला।
“तुम रो क्यों रही हो?” जय ने शीतल से पूछा।
शीतल कुछ नही बोली जैसे उसने कुछ सुना ही नही। जय ने फिर पूछा इस बार जय ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया था। शीतल ने कोई प्रतिक्रिया नही की सिर्फ़ नज़रें उठा कर जय की ओर देखा,जय ने अपना हाथ हटा लिया। शीतल कुछ देर जय को इसी तरह देखती रही लेकिन कुछ कहा नही। थोड़ी देर बाद उसने अपनी नज़रें झुका ली।
“जय क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ?”शीतल ने अपनी आखों से आँसू पोछते हुए जय की ओर देखे बिना ही कहा।
“हाँ,पर बात क्या है?” जय ने गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी करते हुए पूछा।
शीतल बिल्कुल शांत हो गयी,वो हिम्मत जुटा रही थी जय को सब कुछ बताने की पर वो कुछ नही कह पायी,किसी गहरी सोच में डूब गयी।
“शीतल क्या हुआ?”जय ने पूछा।
शीतल ने जय की ओर देखा और उसके बाद उसने अपनी पूरी कहानी जय को सुना दी। कैसे उसकी मुलाकात राज से हुई,किस तरह उनकी शादी हुई सभी कुछ जो कुछ उसके साथ घर छोड़ने के बाद हुआ था। अनुज सर के बारे में,उन्होने उसे किस शर्त पर रुपये दिये। राज के घर वालों ने उसके साथ जो व्यवहार किया। उसने हर एक बात जय को बता दी।
जय की आखें भी नम हो गयी थीं। दोनों गाड़ी में ही बैठे थे । जय ने शीतल के आँसू अपने हाथों से पोछे और उसके सर को अपने कंधे पर रख कर उसे दिलासा देने लगा। वो शीतल के बालों को सहलाने लगा,बार-बार उसके सर पर हाथ फेर रहा था लेकिन फिर भी जय उसे किसी भी तरह से शांत नही करा सका। रोते-रोते शीतल कब सो गयी उसे पता ही नही चला। जय ने उसे जगाया नही ना ही उसके सिर को अपने कंधे से हटाया। उसने गाड़ी स्टार्ट करी और वहाँ से चल दिया।
एक घंटे के बाद शीतल की आँख खुली,उसके सामने जय बैठा था और वो सोफे पर लेटी थी। वो अभी भी जय के घर में ही थी। शीतल झटके से उठ कर बैठ गयी।
“मुझे वापस यहाँ क्यों लाए?” शीतल ने पूछा।
“दीदी कह रही हैं कि तुमने सुबह कुछ खाया नही था,” जय ने उसकी बात को टालते हुए कहा।
“मैं वहाँ खाना खा लेती पर तुम मुझे यहाँ क्यों ले आए,”शीतल ने पूछा।
“तुम्हे रुपेयों की ज़रूरत है,ये लो 2 लाख,” जय ने उसे रुपये पकड़ाते हुए कहा।
“मुझे हॉस्पिटल छोड़ दो,” शीतल ने रुपये पकड़ते हुए कहा। उसने रुपये लेने में कोई हिचक नही दिखाई।
“कल चली जाना,” जय ने कहा।
शीतल ने जय की ओर गुस्से से देखा पर ये उसका घर था इसलिए वो उसे कुछ कह नही पाई। ज्योति भी अपने कमरे से बाहर हॉल मे आ गयी थी। वो शीतल का चेहरा देखकर सब समझ गयी।
“शीतल तुम खाना खा लो,फिर मैं तुम्हे छोड़ दूँगी,” ज्योति ने शीतल से कहा।
शीतल कुछ नही बोली,उसने खाना खा लिया।
“मैं कुछ मेडिसिन के नाम लिख दे रही हूँ तुम इन्हे कुछ दिन तक खा लेना,” ज्योति ने शीतल से कहा और उसे मेडिसिन के नाम लिख कर पर्चा पकड़ा दिया।
“जय,शीतल को अभी छोड़ कर आओ,” ज्योति ने जय से कहा।
जय,ज्योति की बात को टाल नही सका। उसे शीतल को हॉस्पिटल छोड़ने जाना पड़ा। जय शीतल को हॉस्पिटल के बाहर छोड़ कर चला गया।
शीतल सबसे पहले हॉस्पिटल के काउंटर पर 2 लाख रुपये जमा करने गयी लेकिन किसी ने पहले ही पैसे जमा कर दिए थे। शीतल ने कुछ नही पूछा और राज के पास चली गयी।
राज सो रहा था या फिर आँख बंद करके लेटा था। देखने में वो बिल्कुल ठीक लग रहा था पैर का प्लास्टर भी खुल चुका था। शीतल राज के सिर के पास स्टूल पर बैठ गयी,अपना एक हाथ राज के सर पर रख दिया। हाथ रखते ही राज की आँख खुल गयी।
“अब तबीयत कैसी है?” शीतल ने पूछा।
“ठीक हूँ……। तुम दो दिन कहाँ थी?” राज ने पूछा।
शीतल ने उसकी बात का जवाब नही दिया और पानी पीने का बहाना बना कर वहाँ से हट गयी। वो रूम से बाहर निकली तो देखा की सुषमा सामने से आ रही थी।
“कहाँ चली गयी थी तुम?” सुषमा ने शीतल के पास पहुँचते ही उससे पूछा।
शीतल कुछ नही बोली,अपनी नज़रें नीचे झुका ली।
“तुम्हें मालूम है सब तुम्हारे बारे में किस तरह की बातें कर रहे हैं। राज के मम्मी-पापा आए थे। वो तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे,तुम्हारे मम्मी-पापा भी आए थे। वो सब तो यहाँ तक कह रहे थे की तुम किसी के साथ भाग गयी हो। राज को तुम्हारे बारे में ऐसी झूठी बातें बताई गयी हैं कि अब वह तुम से कभी मिलना भी नही चाहेगा। उसे नफ़रत हो गयी है,अच्छा होगा की तुम अपने घर चली जाओ। राज अब तुम्हें नही अपनाएगा,”सुषमा ने शीतल को समझाते हुए कहा।
शीतल की आँखों से आँसू बहने लगे पर मुँह से एक शब्द भी नही निकला। सुषमा ने उसे रोने की वजह दे दी थी। शीतल वहीं साइड में पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी,उसने सुषमा को जाने का इशारा किया,सुषमा चली गयी। दो घंटे बाद शीतल फिर से राज के पास गयी। राज की आखें बंद थी। शीतल वहीं स्टूल पर बिना आहट किए बैठ गयी,वो जैसे ही बैठी थी की किसी ने रूम का दरवाजा खोला,शीतल उसे देखकर एक झटके से उठ खड़ी हुई,राज के पापा थे। वो बड़ी तेज़ी से अंदर आए राज के बगल में बेड की दूसरी ओर खड़े हो गये। उनका ध्यान शीतल की ओर नही गया था जैसे ही वो बैठने वाले थे की उनकी नज़र शीतल पर पड़ी।
“तुम अब यहाँ क्यों आई हो?” राज के पापा ने पूछा।
शीतल कुछ नही बोली।
“मेरे बेटे का पीछा छोड़ दो और यहाँ से चली जाओ। एक बार मेरे राज ने तुम्हें अपना लिया इसका मतलब यह नही की वो तुम्हें हर बार अपना लेगा। तुम क्या सोचती हो कि राज इस समाज की गंदगी को अपनाता रहेगा। हमने सोचा था कि जो हुआ उसे भूल कर तुम्हें अपना लें लेकिन तुम्हे तो कोई भी रिश्ता नही निभाना आता है। पहले अपने माँ-बाप को छोड़ा और अपने पति को भी,” राज के पापा ने कहा।
“नही पापा,मैंने कुछ भी ग़लत नही किया है,” शीतल ने कहा।
“तुम्हारे लिए कुछ ग़लत है भी, तुम जैसी लड़की सिर्फ़ लोगों की जिंदगी बर्बाद करती हो। लोग अपनी इज़्ज़त के लिए क्या कुछ नही करते और तुमने पैसों के लिए खुद को ही बेच दिया,तुमने अपना ही सौदा कर लिया। तुम्हे लगता है की तुम कुछ भी करोगी किसी को कुछ पता नही चलेगा,तुम यहाँ किसी अमीर लड़के के साथ उसकी गाड़ी से आई थी,” राज के पापा ने कहा।
“पापा,उसने मेरी मदद की थी मेरा उसके साथ कोई संबंध नही है,” शीतल ने कहा।
“हो सकता है की उसने तुम्हारी मदद की हो पर कोई किसी को 2 लाख रुपये ऐसे ही नही दे देता। तुमने सिर्फ़ 2 लाख के लिए अपने आप को बेच दिया। समाज ने तुम जैसी लड़कियों को ठीक ही नाम दिया है। तुम जैसी चरित्रहीन लड़की मेरे बेटे की पत्नी नही हो सकती,”राज के पापा ने कहा।
“पापा,बस करिए किसी भी लड़की के चरित्र पर आप इस तरह से उंगली नही उठा सकते,आप ऐसे कैसे मुझे कुछ भी कह सकते हैं। मैं अपने पति को धोखा नही दिया,मुझे अपने आप को सही साबित करने की कोई ज़रूरत नही है। जब आप मुझे अपनी बहू नही मानते तो आप मुझे कैसे कुछ कह सकते हैं। मुझे कुछ भी कहने का अधिकार सिर्फ़ राज को है,” शीतल ने कहा। इस बार वो रोयी भी नही थी , उसने अपने आँसुओं को बहने नही दिया।
“तुम सोचती हो की राज तुम्हे अपना लेगा,ऐसा कुछ नही होगा राज तुमसे नफ़रत करने लगा है। तुमने उसके विश्वास को तोड़ा है,वो तुम्हे कभी माफ़ नही करेगा,बैठी रहो यहीं कुछ देर में जब वो उठेगा तो वो खुद ही तुमसे रिश्ता तोड़ देगा,तब रोना बैठ कर,” राज के पापा ने कहा और वो कमरे से बाहर चले गये।
शीतल ने उन्हें तो जवाब दे दिया था लेकिन उसे डर लग रहा था कि राज कहीं उसे ठुकरा ना दे। कहीं दो दिन में राज के दिल में उसके लिए नफ़रत तो नही भर गयी। शीतल खुद को कोस रही थी,दिल ही दिल वो बहुत रो रही थी लेकिन उसकी आँखें नम नही हुई थीं। तभी उसके हाथ पर किसी ने हाथ रखा,राज था। वो जाग गया था शीतल का पूरा शरीर काँपने लगा उसकी धड़कने बिल्कुल रुक सी गयी। अब अगर राज ने भी उससे यही बात कही तो वो क्या करेगी उसे कुछ नही सूझ रहा था इतनी देर से रुके आँसू,आँख से बहने लगे। शीतल ने राज की ओर देखा भी नही अपनी नज़रें झुकाए बैठी रही वो खुद को राज की हर बात सुनने और हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार कर रही थी।
“रो क्यों रही हो?पागल,” राज ने कहा।
शीतल ने अपनी नज़रे नही उठाई,उसका रोना और तेज हो गया। ऐसी रोती हुई आवाज़ में उसने कहा-“मुझे माफ़ कर दो। ”
“किस लिए?तुमने कुछ भी ग़लत नही किया है,मुझे तुम पर भरोसा है,मैं तुम्हारा साथ कभी नही छोड़ूँगा,”राज ने कहा।
शीतल को तो जैसे विश्वास ही नही हो रहा था। राज ऐसा कुछ कह सकता है उसने सोचा ही नही था। उसे समझ नही आ रहा था कि आख़िर हो क्या रहा है। एक ओर राज कहता कि उसे उससे प्यार नही और दूसरी ओर वो उस पर इतना भरोसा दिखाता है। शीतल राज के गले से लग कर रोने लगी। राज ने उसके आँसू पोछे और उसे चुप कराया। राज को शीतल को चुप करना बहुत अच्छी तरह से आता था। शीतल को भी राज की सबसे खास बात यही लगती थी की वो उसे आसानी से चुप करा देता है जबकि उसे कोई भी चुप नही करा पाता था। वो अपने घर में भी जब भी रोती तो कभी कोई चुप नही करा पाता था। वो रोते-रोते सो जाती थी पर चुप नही होती थी।
“अब मुझे छोड़ोगी हॉस्पिटल है,” राज ने हँसते हुए कहा।
शीतल थोड़ा शर्मा गयी,वो तुरंत राज से दूर हट गयी।
“तुम जीन्स-टॉप कब से पहनने लगी?” राज ने पूछा।
“क्यों?अच्छी नही लग रही हूँ क्या?”
“तुम हमेशा अच्छी लगती हो,” राज ने कहा।
शीतल हँसने लगी,हँसते हुए बोली-“मुझे छेड़ो मत। ”
“तुमने आज कुछ खाया है या भूखी हो,” राज ने पूछा।
शीतल चुप हो गयी। राज समझ गया की शीतल ने कुछ नही खाया है। उसने शीतल को उसकी लापरवाही के लिए थोड़ा डांटा। शीतल खाना खाने के लिए हॉस्पिटल के बाहर चली गयी।
एक घंटे बाद वो लौटी तो देखा की राज के पास रिया(राज की छोटी बहन) बैठी थी। शीतल को देखते ही उससे गले लग गयी। राज के घर में एक रिया थी जो राज को देखने हर रोज़ आती थी। रिया,शीतल को पसन्द करती थी वो शीतल को समझती थी। इतने दिनों में शीतल अपना दुख उसी से तो बाँट सकी थी। रिया जब भी राज को देखकर हॉस्पिटल से घर जाती थी तो अपने मम्मी-पापा को बताती थी कि भैया की तबीयत कैसी है?शीतल के दो दिन गायब रहने पर उसी ने तो घर में बताया था कि भैया की देखभाल करने वाला कोई नही है। उसी के मनाने पर राज के घर वाले उसे देखने आए थे।
“भाभी , आप कहाँ चली गयीं थी?” रिया ने पूछा।
शीतल ने उसे और राज को पूरी कहानी सुना दी। रिया ने शीतल को बताया कि उसके पापा ने अनुज सर के पूरे पैसे उन्हें वापस कर दिए हैं और हॉस्पिटल की जो भी फीस बाकी थी वो सब उन्होनें भर दी है। रिया कुछ देर रुकने के बाद घर चली गयी। रिया 9th में पढ़ती थी।
“शीतल,डॉक्टर कह रहे थे की एक-दो दिन में मैं घर जा सकता हूँ,”राज ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली । उसने राज को उसकी दवाइयाँ दी और खुद वहाँ से हट गयी।
दो दिन बाद राज घर आ गया। उसकी तबियत ठीक थी पर वो ठीक से चल नही पता था। शीतल अपने ऑफिस जाने लगी। राज जब से हॉस्पिटल से घर आया था तब से कुछ अलग ही व्यवहार कर रहा था वो दिन भर लेटा रहता और शीतल से कुछ ना कुछ करने को कहता रहता। शीतल सुबह ऑफिस जाने से पहले खाना बनाकर जाती थी,आती तो भी वही खाना बनाती थी। घर का सारा काम भी वही करती थी लेकिन उसके बाद भी राज उससे कुछ ना कुछ कहा ही करता था।
शीतल,मेरे लिए फल लेती आना,शीतल एक लैपटॉप ले आना,शीतल ये ले आना, वो ले आना बहुत कुछ कहता रहता था। एक बार भी ये नही सोचता था की शीतल के पास इतने पैसे कहाँ से आएँगे,वो उसके लिए लैपटॉप कैसे लाएगी कुछ भी नही। वो लगभग पूरी तरह से ठीक ही था लेकिन वो कुछ नही करता था। एक गिलास पानी भी वो खुद नही लेता वो भी शीतल से माँगता था। शीतल रात को राज के सोने के बाद ही सोती थी और सुबह राज से पहले उठती थी। वो कहीं से भी रुपयों का इंतज़ाम करके राज के लिए हर वो चीज़ लेकर आती जो उसे चाहिए होता था। उसने राज को लैपटॉप खरीद कर दे दिया। राज दिन भर लैपटॉप चलाता रहता,जब शीतल कहीं जाने लगती तो उससे कहता शीतल नेट पैक करा देना। शीतल राज से थोड़ा चिढने लगी थी,राज उससे जब कुछ कहता तो उसे बहुत गुस्सा आता था लेकिन वो राज से कुछ भी नही कहती थी। शीतल के राज से चिडने की वजह राज का ही व्यवहार था,ऐसा लग रहा था जैसे राज ने शीतल को परेशान करने की कसम खा ली हो या फिर उससे कोई बदला ले रहा है।
शीतल अपने घर आने जाने लगी थी। दोनों के घर वाले मान गये थे। राज के परिवार वाले शीतल को अपनी बहू मानने के लिए तैयार थे। एक दिन राज के मम्मी-पापा उन्हें घर वापस ले जाने के लिए आए। पर राज ने घर वापस जाने से मना कर दिया।
“तुम घर चलने के लिए क्यों तैयार नही हो?” राज की माँ ने राज से पूछा।
“जिस घर में मेरी पत्नी की कोई इज़्ज़त ना हो उस घर में मैं नही रह सकता। आप ने ही सिखाया है कि पति का धर्म होता है कि वो पत्नी का हर सुख-दुख में साथ दे। शीतल 3घंटे तक बारिश में बाहर भीगती खड़ी रही पर किसी को कोई फ़र्क नही पड़ा,उसे क्या कुछ नही कहा आप लोगो ने। मैं हमेशा यही सोचता था कि कब आप लोग हमें माफ़ करोगे,कब हमें घर वापस आने के लिए कहोगे,मैं घर वापस आना चाहता था लेकिन अब मुझे घर नही चलना। मैं बेटे होने का हर फ़र्ज़ निभाऊँगा, पर घर कभी नही…………शीतल आपसे मिलने घर जा सकती है पर मैं नही…………” राज ने कहा।
उसके मम्मी-पापा राज से कुछ नही कह सके वो चुपचाप वहाँ से चले गये। शीतल भी वहीं बैठी थी उसने रोकना तो चाहा पर राज की वजह से चुप हो गयी। राज बहुत बदल गया था वो शीतल से ही नही अपने मम्मी-पापा से भी अच्छे से बात नही कर रहा था। शीतल ने उनके जाने के बाद राज को समझाना चाहा पर उसने शीतल को इस बारे में कोई भी बात करने से साफ मना कर दिया।
राज को हॉस्पिटल से घर आए 20 दिन हो गये। उसका पैर भी ठीक हो गया था। वो कहीं भी आ-जा सकता था , पर राज कहीं नही जाता , दिन-भर घर में ही रहता था।
राज की बेरूख़ी की वजह से शीतल का जय के साथ मिलना जुलना बढ़ गया था। वो अक्सर ओफिस से थोड़ा देर से घर आती थी,वो जय के साथ घूमा करती थी। जय उसे तरह-तरह के गिफ्ट दिया करता था,कभी कोई ड्रेस तो कभी कुछ। वो जय के साथ फाइव स्टार होटल जाती तो कभी किसी कॉफी शॉप। जय से उसकी दोस्ती बढ़ती जा रही थी दूसरी ओर वो राज से दूर होती जा रही थी। शीतल,जय को अपने घर भी ले गयी,उसने उसे अपनी मम्मी,पापा और प्रिया से मिलाया। जय बहुत खुले विचारों का था । साथ में उसे नये लोगों से जुड़ना अच्छी तरह से आता था इसलिए उसने शीतल के घर वालों से जल्दी व्यवहार बना लिया। शीतल की मम्मी को शीतल का जय के साथ इस तरह घूमना फिरना अच्छा नही लगा । उन्होंने उसे समझाया पर उसने एक ना सुनी।
“शीतल,तुम्हारी शादी हो चुकी है और तुम्हारा जय के साथ इस तरह से घूमना अच्छी बात नही है। लोग क्या कहेंगे?”शीतल की माँ ने कहा।
“मम्मी,जय मेरा दोस्त है और कुछ नही। मुझे समझ है की क्या ग़लत है और क्या सही?”शीतल ने बहुत हल्के में अपनी मम्मी की बात लेते हुए कहा।
“तुम राज को धोखा दे रही हो,राज के भरोसे को तोड़ रही हो,” शीतल की माँ ने कहा।
“मैं किसी को धोखा नही दे रही हूँ,मम्मी,” शीतल ने कहा और वहाँ से हट कर दूसरे कमरे में जहाँ जय था चली गयी।
जय की वजह से शीतल ने सुषमा से भी बोलना कम कर दिया था। शीतल सुबह ऑफिस जय के साथ ही जाती थी और वापस भी जय के साथ आती थी। सुषमा ने उसे कई बार जय के साथ कॉफी शॉप में देखा था । उस समय शीतल जीन्स या फिर किसी और वेस्टर्न में होती थी जबकि वो घर से सलवार-सूट में ऑफिस आती थी और जब घर जाती थी तो भी सलवार सूट में आती थी।
शीतल ने रात में जाग कर पढ़ना भी बंद कर दिया था। उसके सारे सपने साकार हो रहे थे। बचपन से जिन खुशियों की आश में वो जीती थी,वो सब पूरे हो रहे थे। राज के व्यवहार से उसे कुछ दुख तो होता था पर जय की वजह से उन्हें भूल जाती थी।
एक दिन राज लैपटॉप चला रहा था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया दिन के 1 बज रहे थे। राज ने दरवाजा खोला तो देखा की सुषमा थी। राज ने उसे अंदर आने को कहा तो वो अंदर आ गयी।
“तुम आज ऑफिस नही गयी,” राज ने सुषमा को पानी देते हुए कहा।
“आज ऑफिस बंद है,” सुषमा ने कहा।
“शीतल तो गयी है,” राज ने कहा।
“राज तुम्हे पता नही शीतल कहाँ है?”
“नही,मैंने सोचा ऑफिस जा रही होगी इसलिए नही पूछा,”राज ने कहा।
“शीतल,जय के साथ है। वो हर रोज़ जय से मिलती है,उसके साथ होटल,बार ……… जाती है। वो तुम्हे धोखा दे रही है। वो घर से सूट में निकलती है और बाहर वेस्टर्न ड्रेस में दिखती है। तुम उस पर ध्यान क्यों नही देते हो?उसका जय की तरफ लगाव का कारण शायद तुम्हारा रूखा व्यवहार है। तुम कुछ करते क्यों नही?घर बैठे शीतल की कमाई खा रहे हो। उसे जय से वो सब कुछ मिल रहा जो वो चाहती है और तुमसे उसे कुछ भी नही मिलता। मुझसे ये मत कहना की जय सिर्फ़ शीतल का दोस्त है और कुछ नही। शीतल ने मुझसे कहा है की जय ठीक वैसा है जैसा पति वो चाहती थी,उसमें वो सारी खूबियाँ हैं जो वो अपने पति में चाहती थी। अगर तुम दोनों एक-दूसरे के साथ खुश नही हो तो ये रिश्ता ख़त्म कर दो। इस तरह से एक-दूसरे की जिंदगी बर्बाद ना करो………राज जॉब नही कर रहे तो कम से कम अपनी पत्नी को संभालना ही सीख लो। सिर्फ़ अच्छाई से जिंदगी नही जी जाती,कुछ करना भी होता है,इस तरह से घर बैठे नही रहा जाता। तुम अब पूरी तरह से ठीक हो गये हो………,” सुषमा ने कहा और पानी बिना पिए ही उठकर चली गयी।7.
उस दिन शीतल रात के 10 बजे घर आई उसने जीन्स-टॉप पहना हुआ था जबकि सुबह जाते समय उसने सलवार सूट-पहना हुआ था। शीतल बहुत थकी हुई थी,वो बाथरूम में कपड़े बदलने के लिए जाने लगी।
शीतल मुझे तुमसे बात करनी है,राज ने शीतल से कहा।
शीतल ने उसकी बात पर कोई ध्यान नही दिया और बाथरूम में चली गयी। जैसे ही वो बाथरूम से कपड़े बदल कर बाहर निकली तुरंत ही राज ने फिर कहा-“शीतल मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। ”
“सुबह करना अभी मैं थक गयी हूँ,” शीतल ने कहा और वो लेट गयी।
“पर मुझे अभी बात करनी है,” राज ने गुस्से में कहा।
“अभी नही सुबह।”
“मुझे अभी इसी वक्त तुमसे बात करनी है,” राज ने चिल्लाते हुए कहा।
शीतल भी पीछे नही रहने वाली थी,वो उठ खड़ी हुई और चीखती हुई बोली-“तुम्हे तभी क्यों बात करनी होती है जब मुझे नही करनी होती है……यही पूछना है की मैं कहाँ गयी थी………सुबह सब कुछ बता दूँगी। ”उसके बाद वो फिर से लेट गयी। राज से कुछ भी बोलते नही बना,वो लैपटॉप चलाने लगा।
शीतल लेटे हुए करवटें बदल रही थी उसकी आँखों में नींद नही थी। अचानक उसे क्या सूझा की राज से पूछी-“तुमने खाना खाया है? ”
राज कुछ भी नही बोला ना ही उसकी ओर देखा उसने ऐसे जताया जैसे उसने उसकी बात सुनी ही नही।
शीतल ने फिर पूछा। पर जब राज से कोई जवाब नही मिला तो वो उठी और बर्तन देखने लगी,शाम को उसने कुछ भी नही बनाया था। वो राज के लिए खाना बनाने लगी। उसने कई बार राज से बात करने की कोशिश की लेकिन राज कुछ भी नही बोला। खाना बनाने के बाद उसने राज को खाना खाने के लिए दिया,राज ने खाने की ओर देखा भी नही। शीतल ने उससे बड़ा मासूम-सा चेहरा बनाते हुए प्यार से कहा-“खाना खा लो,मुझ पर बाद में गुस्सा हो लेना।”
राज ना तो कुछ बोला ना ही उसने खाना खाया।
शीतल खाना उसके बगल में रख कर फिर लेट गयी। वो बीच-बीच में चुपके से आँख खोल कर देखती की राज ने खाना खाया या नही पर राज ने खाने को हाथ भी नही लगाया। 15 मिनट बाद उसने लेटे हुए ही कहा-“खाना खा लो फिर लैपटॉप चलाना। ”
इस बार राज ने शीतल की ओर देखा और फिर लैपटॉप में काम करने लगा। शीतल को राज पर गुस्सा भी आ रहा था और उसे भूखा भी नही देखा जा रहा था। वो फिर बोली-“खाना खा लो…………”कहते-कहते वो भावुक हो गयी और आगे के शब्द कह नही पाई। इस बार फिर राज शीतल की ओर देखे बिना नही रह पाया, उसने शीतल की रोनी सूरत देखी तो खाना खाने लगा पर शीतल से कुछ बोला नही। शीतल की आँख से आँसू बहने लगे। राज खाना खाने के बाद फिर से लैपटॉप चलाने लगा।
“तुम मुझे इतना रुलाते क्यों हो?” शीतल ने कहा।
राज ने उसकी बात पर कोई ध्यान नही दिया और लैपटॉप में इंटरनेट चलाने लगा। शीतल उसके बगल में बैठ गयी पर राज ने उसकी ओर देखा भी नही। शीतल ने लैपटॉप बंद करके एक किनारे रख दिया,राज फिर भी कुछ नही बोला और वहीं लेट गया।
“मुझे माफ़ कर दो,” शीतल ने राज से कहा।
“सुबह बात करेंगे,” राज ने कहा।
राज लेट कर सो गया पर शीतल की आखों में नींद कहाँ थी वो देर रात तक जागती रही,उसे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि क्यों उसने राज पर चीखा?
उसे रात में कब नींद आ गयी उसे पता भी नही चला। सुबह जब वो उठी तो देखा की राज घर में नही था। शीतल ने खाना नही बनाया और अपने ऑफिस चली गयी। शाम को 7बजे ऑफिस से वापस आई तब भी राज नही आया था। राज रात के 11बजे आया।
“कहाँ गये थे?” शीतल ने पूछा।
“काम ढूढ़ने।”
शीतल कुछ नही बोली और उसे खाना निकालकर दे दिया। खाना खाने के बाद राज लैपटॉप चलाने लगा।
“तुम हर समय लैपटॉप में क्या करते हो?”शीतल ने पूछा।
“कुछ नही।”
“कुछ नही क्या……? कुछ तो करते ही होगे।”
“मैं इस शहर की लैपटॉप और कंप्यूटर की बड़ी दुकानों के बारे में पता करता हूँ,” राज ने कहा।
“क्यों?”
“मैं पता कर रहा हूँ की ऐसा कौन सा शोरुम है जिसकी सबसे कम कमाई होती है और लागत ज़्यादा है। मैं उन शोरुम से एक डील करूँगा,” राज ने कहा।
“कैसी?”
“तुम ज़्यादा कुछ मत पूछो,बस इतना समझ लो की अब हमारे पास पैसों की कोई कमी नही होगी,”राज ने कहा।
शीतल राज के सहारे उसके बगल में बैठ गयी,कुछ देर बाद राज ने लैपटॉप बंद कर दिया।
“मैं कल जय के साथ पार्टी में गयी थी,”शीतल ने कहा।
“तुम बता कर भी जा सकती थी,” राज ने कहा।
“मुझे खुद नही मालूम था की वो मुझे पार्टी में लेकर जाएगा,वैसे भी मैं बता कर गयी थी कि मैं जय के साथ जा रही हूँ,” शीतल ने कहा।
राज ने उससे कुछ नही कहा और सो गया। कुछ देर बाद शीतल भी सो गयी। राज हर रोज़ काम की वजह से बाहर जाने लगा था। वो पैसा भी अच्छा कमाने लगा था पर वो जितना कमाता था वो सारा फिर से उसी बिजनेस में लगा देता था।
एक दिन सुबह राज ने शीतल से पूछा-“आज कहीं घूमने चलोगी। ”
“नही,मैं जय के साथ जा रही हूँ,” शीतल ने कहा।
“मत जाओ,मेरे साथ चलो।”
“मैं उसे मना नही कर सकती हूँ…। वो मेरा अच्छा दोस्त है।”
“और मैं?”
“कुछ नही……………,हमारे बीच सिर्फ़ नाम का रिश्ता है और मैं तुमसे दूर नही जा रही हूँ,तुमने ही मुझे खुद से दूर किया है,”शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला,कुछ देर बाद शीतल चली गयी उसके जाने के बाद राज भी चला गया। राज रात को 10 बजे घर आया,शीतल पहले से ही घर पर थी।
“तुम कहाँ गये थे?” शीतल ने पूछा।
“काम पर…। तुम कब आई?”राज ने पूछा।
“मैं तुरंत आधे घंटे में वापस आ गयी थी,”शीतल ने कहा।
“क्यों?जय के साथ जाना था।”
“नही गयी,उसे मैंने मना कर दिया। मुझे तुम्हारे साथ ही चलना था पर जब मैं वापस आई तो तुम नही थे।”
“सॉरी,मैंने सोचा तुम अब शाम को ही आओगी,राज ने कहा और वो लेट गया,शीतल उसके बगल में बैठ गयी।”
“कल कहीं चलोगे,कल मेरा बर्थडे है,”शीतल ने कहा।
“नही कल मेरे पास समय नही है।”
शीतल कुछ नही बोली। अगले दिन राज के जाने के बाद शीतल को लेने जय घर आया शीतल उसके साथ चली गयी,दिन भर उसके साथ घूमी,जय के साथ उसने अपना जन्मदिन बहुत अच्छे से मनाया। जय के साथ ही वो अपने मम्मी –पापा से मिलने गयी। शीतल बहुत खुश थी उसकी खुशी की वजह जय था जो उसका जन्मदिन इतने अच्छे से मना रहा था। अच्छा हुआ जो राज ने उसके साथ कहीं जाने के लिए मना कर दिया था नही तो वो इतने अच्छे से अपना जन्मदिन ना मना पाती। शीतल की मम्मी को भी जय अच्छा लगने लगा था।
“शीतल,अगर तुम राज के साथ खुश नही हो तो उसे तलाक़ दे दो,तुम जय के साथ ज़्यादा खुश हो,जय से शादी कर लो। जबरजस्ती अपने रिश्ते को मत खीचों,”शीतल की मम्मी ने शीतल से कहा।
शीतल कुछ नही बोली,उसने हसते हुए बात को टाल दिया। जय ने उसे डाइमंड नेक्लेस गिफ्ट किया।
शीतल रात 9 बजे घर पहुँची,राज घर जल्दी आ गया था।
“तुम आज घर जल्दी आ गये,”शीतल ने पूछा।
“काम थोड़ा कम था इसलिए,” राज ने कहा।
शीतल राज के बगल बैठ गयी,उसे पूरे दिन की कहानी सुनाने लगी,राज उसकी हर एक बात को मुस्कुराते हुए सुन रहा था। कुछ देर बाद उसने शीतल को एक सोने की अंगूठी दी।
“आज मुझे जय ने डाइमंड नेक्लेस दिया, 2-3 लाख का होगा पर मैंने उसे नही लिया इतना महँगा गिफ्ट मुझे लेना ठीक नही लगा,” शीतल ने अंगूठी पकड़ते हुए कहा।
“क्यों?”
“वो मुझे दिखाना चाहता था की वो कितना अमीर है इसलिए मैंने नही लिया पर सुंदर बहुत था,”शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला। शीतल ने अँगूठी देखते हुए कहा-“तुम्हारे पास इतने पैसे थे,…………। क्या किसी से उधार लिए हैं?”राज कुछ नही बोला तो उसने अपनी पर्स से कुछ रुपये निकाल कर राज को दे दिए। राज ने रुपयों की ओर देखा भी नही वो ऐसे ही बिस्तर पर पड़े रहे।
“इतना खर्च करने की क्या ज़रूरत थी,अभी तो तुमने कमाना शुरू ही किया है और अभी से………,” शीतल ने कहा।
राज फिर भी कुछ नही बोला।
“मम्मी,कह रही थी कि मुझे जय से शादी कर लेनी चाहिए,मैं उसके साथ ज़्यादा खुश हूँ,” शीतल ने कहा।
“कर लो।”
“नही करनी,” शीतल ने हँसते हुए कहा।
“क्यों?”
“नही करनी बस इसलिए नही करनी।”
राज ने रुपये उठा कर वापस उसे पकड़ा दिए , पर शीतल ने वापस लेने से मना कर दिया।
“मुझे इन रुपयों की कोई ज़रूरत नही है। क्या तुम समझती हो कि मैं तुम्हे एक गिफ्ट भी खरीद कर नही दे सकता?”राज ने कहा।
“मैं तुम्हे नीचा नही दिखा रही,राज,मैं इतना कहना चाहती हूँ कि तुम्हारा हर गिफ्ट मेरे लिए खास है तुम्हें मुझे खुश करने के लिए जय की तरह दिखावा करने की ज़रूरत नही है,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला,वो बिस्तर से उठा और मेज से केक उठा कर उसके सामने रख दिया। उसने शीतल का बर्थडे बहुत अच्छे से मनाया। घंटों वो दोनों मस्ती करते रहे। शीतल खुश थी कि राज ने उसका इतना ख्याल रखा,उसे तो उम्मीद भी नही थी कि राज ऐसा कुछ भी करेगा। शीतल के साथ रहते-रहते राज भी थोड़ा चंचल हो गया था।
जब वो सोने लगे तो शीतल ने राज को छेड़ते हुए उससे पूछा-“वैशाली कौन है?”
“कौन वैशाली?”राज ने आश्चर्य से शीतल की ओर देखते हुए कहा।
शीतल राज के बहुत पास आ गयी और उससे बोली-“वही जिसे तुम हर रोज़ फ़ेसबुक पर सर्च करते हो।
”राज का तो जैसे खून जम गया उससे कुछ भी बोला नही गया।
“मैंने तुम्हारी सर्च हिस्ट्री देखी थी,” शीतल ने कहा।
“वैशाली मेरी दोस्त थी,और कुछ नही,” राज ने कहा और अपनी आँखें बंद करके सोने लगा।
शीतल ने राज का मुँह अपने हाथों से अपनी ओर कर दिया ओर उसकी आँख खोलते हुए बोली-“मुझे सब कुछ बताओ अपने और उसके बारे में। ”
“कोई नही है,” राज ने दबाव देते हुए कहा।
“सच बताओ……। नही तो कभी बात नही करूँगी।”
“ना करो……।”
“बताओ….. सब कुछ।”
“वैशाली मेरे साथ पढ़ती थी,मैं उसे प्यार करता हूँ तब से जब मैं 11साल का था और 7 में पढ़ता था। वो बहुत सुंदर है,वो सिर्फ़ मुझसे ही बात करती थी और किसी लड़के से नही अगर मैं किसी लड़की से बात करता था वो चिढ़ जाती थी। जब वो हँसती थी तो उस समय वो मुझे बहुत सुंदर लगती थी लेकिन मुझे उससे कहने में बहुत डर लगता था क्यों कि वो सख़्त है और इस तरह की बातें उसे पसंद नही है। मैं उससे कभी कह नही पाया की मैं उससे प्यार करता हूँ पर स्कूल छोड़ने से पहले मैंने किसी से उस तक बात पहुँचा दी पर उसने साफ मना कर दिया। स्कूल छूटने के बाद हम कभी नही मिले। इसलिए उसे फ़ेसबुक पर सर्च करता हूँ,” राज ने कहा।
“आज भी उससे उतना ही प्यार करते हो,” शीतल ने पूछा।
“मालूम नही………शायद हाँ,” राज ने कहा।
“बहुत सुंदर है?” शीतल ने पूछा।
“हाँ और बहुत अच्छी भी है,” राज ने कहा।
“मुझसे भी,” शीतल ने दबी आवाज़ में कहा जैसे उसे जलन हो रही हो।
“शीतल तुम्हारी उसके साथ कोई बराबरी नही है और ना ही कभी मैंने तुम्हारी और उसकी कोई तुलना की है…………,” राज ने कहा।
शीतल कुछ नही बोली।
“क्या तुमने कभी किसी से प्यार किया है?” राज ने शीतल से पूछा।
“नही।“
“जय से…………,” राज ने कहा।
“नही। वो तुम्हे प्यार क्यों नही करती है?” शीतल ने पूछा।
“मैं जय जितना स्मार्ट नही हूँ कि मुझे शीतल जैसी लड़की प्यार करे,”राज ने कहा।
“फिर भी जय को मुझ जैसी लड़की नही मिली,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला। शीतल ने अपने हाथों की पाँचो उंगली राज की उंगलियों मे फँसा दी और उसका हाथ कस के ज़कड़ लिया।
“तुमने कभी किसी से प्यार नही किया,” राज ने ज़ोर देकर पूछा।
“किया है………,” शीतल ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा।
“और उसने तुमसे,” राज ने पूछा।
“वो मुझ पर भरोसा करता है,मेरी देखभाल करता है,मेरे लिए सब कुछ करता है पर प्यार मुझसे …………,” शीतल चुप हो गयी।
“क्या हुआ चुप क्यों हो गयी?” राज ने पूछा।
“कुछ नही,” शीतल ने कहा और अपनी नज़रें झुका ली।
“वो तुमसे प्यार नही करता क्या?” राज ने पूछा।
“मालूम नही ! ना मुझे ना ही उसे,” शीतल ने कहा।
दोनों एक पल के लिए शांत हो गये। पूरे कमरे में एक खामोशी सी छा गयी सिर्फ़ पंखा चलने की आवाज़ आ रही थी।
“अगर तुम्हे,मुझे और वैशाली में किसी एक को चुनना हो तो तुम किसे चुनोगे?” शीतल ने राज से पूछा।
“मुझे नही मालूम………। अगर वो लड़का तुम्हे प्यार करने लगे तो क्या तुम मुझे छोड़ दोगी?”
“कुछ और बात करें,” शीतल ने कहा।
“नही,पहले जवाब दो।”
शीतल ने जवाब नही दिया। वो दोनो एक दूसरे से खुल कर बात कर रहे थे,ऐसा लग रहा था जैसे दोनो में बहुत प्यार है पर बातें दोनो ऐसी कर रहे जो कोई भी पति पत्नी शायद कभी भी ना करें। दोनों किसी और से प्यार करते थे।
“मुझे लगता था कि तुम्हें लड़कियों में कोई दिलचस्पी नही पर तुम तो…………,” शीतल कहते-कहते चुप हो गयी।
“वो है ही ऐसी की किसी को भी उससे प्यार हो जाए,……। बहुत सुंदर है वो,” राज ने कहा।
“शायद तुम उससे सच्चा प्यार नही करते,तुम सिर्फ़ उसके ……। अगर उससे सुंदर कोई मिल जाए तो शायद तुम उसे………,” शीतल ने अधूरी बात ही कही।
“मैं समझ सकता हूँ की तुम क्या कहना चाहती हो,पर मैं उससे सच्चा प्यार करता हूँ,तुम उससे बहुत ज़्यादा खूबसूरत हो पर मैंने कभी भी तुम्हे हाथ तक नही लगाया,” राज ने कहा।
शीतल की नज़रें झुक गयी,उसके पास कोई भी जवाब नही रह गया था पर उसे अच्छा भी लग रहा था की राज ने उसे सुंदर कहा और वो वैशाली से सुंदर है।
“तुम वैशाली से ज़्यादा अच्छी हो,” राज ने फिर कहा।
शीतल हल्का-सा मुस्कुरा दी और अपने बालों को ऊपर करने लगी।
“तुम अपनी जॉब छोड़ दो,”राज ने कहा।
शीतल,राज को ऐसे देखने लगी जैसे राज ने उससे ऐसा कुछ कह दिया हो जो कभी नही कर सकती थी।
“क्यों?”
“अब मैं एक दिन बहुत कमा लेता हूँ,मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ पर 40% की मेरी हिस्सेदारी है।“
“पर मैं जॉब करना चाहती हूँ,” शीतल ने बड़े उदास मन से ज़ोर देते हुए कहा।
“तुम पहले अपनी पढ़ाई पूरी करो और साथ ही आई.ए.एस. की तैयारी करो,” राज ने कहा।
शीतल का चेहरा कमल-सा खिल गया,अपने जिस सपने को वो भूल चुकी थी उस सपने की याद उसे राज ने दिला दी थी। उसके दिल की हर बात को राज बिना कहे ही समझ जाता था।
“ठीक है,”शीतल ने कहा।
उन दोनों को बात करते-करते सुबह के 4 बज गये। दोनों की आखों में नींद नही थी,दोनों एक दूसरे की बातों में खोए हुए थे,बात करते-करते वो कब सो गये उन्हें पता ही नही चला।
सुबह 10 बजे उनकी आँख खुली,राज जल्दी से तैयार हुआ और काम पर निकल गया। उसके जाने के कुछ देर बाद शीतल भी ऑफिस चली गयी। रात को राज 11बजे घर वापस आया पर शीतल घर नही आई थी वो शीतल का इंतज़ार करने लगा पूरी रात निकल गयी पर शीतल घर नही आई,सुबह राज उसे ढूढ़ने लगा हर जगह पता किया शीतल के घर गया,अपने घर पता किया,उसके ऑफिस पता किया पर कुछ पता नही चला। ऑफिस से इतना पता चला की वो कल ऑफिस आई थी और अपने टाइम से घर वापस लौट गयी थी। राज ने सुषमा से पूछा पर उसे भी कुछ नही पता था। राज ने पुलिस में भी पता किया पर किसी को कुछ भी नही मालूम था।
शाम को राज के घर उसके घर वाले, सुषमा और शीतल के मम्मी-पापा आए वो राज को समझा रहे थे,उसे दिलासा दे रहे थे।
“राज,मैंने तुमसे पहले ही कहा था की शीतल को संभाल लो नही तो……………। वो जय के साथ ही होगी,”सुषमा ने कहा।
“नही वो ऐसी नही है,” राज ने कहा।
“क्या ऐसी नही है,राज?तुम्हे छोड़ कर चली गयी है और तुम……,” राज की माँ ने कहा।
“पहले ही कहा था तुमसे की वो अच्छी लड़की नही है,ऐसी लड़की सिर्फ़ घर बर्बाद करती हैं आबाद नही,” राज की भाभी ने कहा।
शीतल के बारे में इस तरह की बाते सुनकर शीतल के मम्मी-पापा का चेहरा शर्म से झुक गया पर वो कह भी क्या सकते थे? जय और शीतल के बारे में उनकी खुद की सोच यही थी।
“राज,हमें माफ़ करना मेरी बेटी की वजह से तुम्हें इतने दुख उठाने पड़ रहे हैं पर अब तुम उसका इंतज़ार मत करो और अपने घर वापस लौट जाओ अगर वापस आती है तो उसे छोड़ देना,तलाक़ दे देना,” शीतल की माँ ने कहा।
“शीतल चरित्रहीन है राज,पहले उसने घर छोड़ा और आज पति, क्या पता अभी और कितनो को ………,” सुषमा ने कहा।
राज के पास उनकी किसी बात का कोई जवाब नही था एक बार शीतल वापस आ जाती तो सब को जवाब दे देता।
“जो लड़की किसी और लड़के को प्यार करती है तुमने उसके लिए अपना घर छोड़ दिया,हम सब से तुमने ऐसी गिरी हुई लड़की के लिए रिश्ते तोड़ लिए,” राज के पापा ने कहा।
किसी को शीतल की कोई परवाह नही थी बस सब के सब उस पर आरोप लगाते जा रहे थे। ऐसा जैसे समाज का नियम है अगर कोई लड़की एक दिन घर ना आए तो सब के सब तरह- तरह की बातें करेंगे कोई भी यह नही सोचता की शायद वो कहीं किसी मुसीबत में ना हो।
“वो जय से प्यार नही करती है ना ही वो चरित्रहीन है,”राज ने कहा।
“कब तक इस झूठे विश्वास के साथ जियोगे?मैं उसकी दोस्त हूँ मैंने उसे बहुत करीब से जाना है वो सिर्फ़ जय को प्यार करती है,तुमसे नही,” सुषमा ने कहा।
राज कुछ नही कह सका।
बहुत देर तक सब शीतल के बारे में बात करते रहे फिर सब अपने-अपने घर चले गये। राज की माँ ने उसे साथ चलने के लिए कहा पर उसने मना कर दिया।
3-4 दिन बीत गये पर शीतल का कोई पता नही चला,हर रोज़ कोई ना कोई आकर शीतल के बारे में राज को भड़कता पर राज को किसी की कोई बात से फ़र्क नही पड़ता वो बस अपनी शीतल का पता लगा रहा था उसे विश्वास था की शीतल वापस ज़रूर आएगी।
एक-दो दिन और राज ने शीतल का पता लगाने की कोशिश की फिर उसने उसका पता लगाना छोड़ दिया और अपने काम पर ध्यान देने लगा। अपने सर की मदद से उसने नया घर भी ले लिया जो बहुत बड़ा और अच्छा था लेकिन वो वहाँ रहने नही गया क्यों कि अगर शीतल वापस आएगी तो उसी घर में नये घर में नही।
10 दिन बीत गये पर शीतल का कोई पता नही चला इस बीच जय के बारे में भी कोई जानकारी नही मिली इसलिए सब को यकीन था की शीतल जय के साथ ही है।
एक दिन सभी लोग फिर से राज को समझाने के लिए उसके घर आए शीतल के मम्मी-पापा,राज के घरवाले और सुषमा। सब उसे शीतल को भूलने के लिए कह रहे थे पर राज को किसी की कोई बात का फ़र्क नही पड़ रहा था सब बात कर ही रहे थे की तभी शीतल आ गयी सब उसे देख कर चौंक गये। शीतल भी सभी को एक साथ देख कर सहम गयी।
“अब क्यों आई हो शीतल,फिर से राज की ज़िंदगी बर्बाद करने के लिए,हम तुम पर नाज़ करते थे और तुमने………। तुम ऐसी होगी मैंने कभी नही सोचा था अगर तुम्हे राज के साथ ऐसा ही करना था तो जब हम कहते थे तब तुमने क्यों नही उसे छोङ दिया कम से कम राज की ज़िंदगी तो ना खराब करती,” शीतल की माँ ने शीतल को देखते ही कहा।
शीतल के कदम थम से गये वो एक जगह खड़ी की खड़ी रह गयी उसकी मम्मी उसे ऐसा कुछ कहेंगी वो कभी नही सोच सकती थी कोई दूसरा कहता तो शायद वो जवाब देने की हिम्मत भी करती पर उसकी अपनी माँ ही उसके चरित्र पर उंगली उठा रही थीं,ऐसे में वो क्या कहती। उसकी आँखो से आँसू की एक बूँद ना गिरी पर उसका दिल रोने लगा था। उसे कोई सहारा देने वाला भी नही था।
“शीतल, मैंने तुम्हारी इतनी मदद की,मैं सोचती थी कि घर छोड़ना तुम्हारी मजबूरी थी पर नही ये तो तुम्हारी आदत है। तुम किसी की नही हो सकती ना तो अपने घर वालों की हुई ना ही अपने पति की और ना ही तुम जय की होगी,” सुषमा ने शीतल से कहा।
शीतल एक जगह खड़ी मूर्ति बनी हुई थी। कौन क्या? और क्यों कह रहा था? उसे कुछ भी नही समझ आ रहा था। उसकी नज़रें झुकी हुई थी उसने सिर्फ़ एक बार नज़र उठा कर राज की ओर उम्मीद के साथ देखा की राज उसके पक्ष में कुछ तो कहे पर राज ने कुछ नही कहा।
“राज को तलाक़ दे दो अब उसकी ज़िंदगी और ना खराब करो,” राज की माँ ने कहा।
“हाँ शीतल, तुम्हें राज को तलाक़ दे देना चाहिए। कम से कम वो तो अपनी ज़िंदगी सकून से जी सके,” शीतल के पापा ने कहा।
“राज, शीतल को तलाक़ दे दो,इस लड़की को किसी की परवाह नही है,इसकी वजह से अपनी ज़िंदगी बर्बाद मत करो। हम सही कह रहे हैं या ग़लत ये तुम खुद देख सकते हो,वैसे भी तुम दोनों एक-दूसरे से प्यार नही करते हो तो क्यों इस रिश्ते में बँधे हो। आज़ाद कर दो एक-दूसरे को,” राज के पापा ने कहा।
हर कोई शीतल को कुछ ना कुछ कहे जा रहा था पर ना तो शीतल ने कुछ कहा ना ही राज ने। राज किससे क्या कहता शीतल के अपने ही तो उसे बुरा कह रहे थे।
कुछ देर बाद हर कोई चला गया रह गये तो शीतल और राज। किसी ने एक बार भी ये नही पूछा की वो कहाँ गयी थी,कहीं किसी मुसीबत में तो नही थी बस सब ने अपना गुस्सा उस पर निकल दिया। राज उसके करीब आया उसने उसे अपने सीने से लगा लिया जैसे कोई किसी को दिलासा देने के लिए करता है। शीतल अपने आँसू को नही रोक पाई सबके जाते ही वो रोने लगी।
“चुप हो जाओ शीतल,किसी की बात का बुरा मत मानो,” राज ने कहा।
शीतल तो जैसे कहीं खो सी गयी थी उसे होश ही नही था। राज उसे अपने सहारे बेड के पास ले गया और उसे बेड पे बिठाया।
“शांत हो जाओ लोग तो कहते ही रहते इसका मतलब ये नही की तुम ग़लत हो,” राज ने कहा।
“तुम्हें मुझ पर विश्वास नही रहा,” शीतल ने खुद को संभालते हुए कहा और राज से दूर हट गयी।
“मैंने कुछ कहा,” राज बोला।
“इसी का तो अफ़सोस है कि तुमने किसी से कुछ नही कहा,” शीतल ने कहा और अपना मुँह तकिये से छुपा कर लेट गयी।
“कुछ खा लो तुम्हें भूख लगी होगी,” राज ने कहा।
“नही लगी है।”
“कुछ तो खा लो।”
शीतल ने कोई जवाब नही दिया। राज ने फिर कहा-“खा लो…। ”
ठीक उसी तरह से जैसे शीतल राज से कहती थी पर शीतल जिद्दी थी वो मानने वालों में नही थी।
“मैं तुम्हे तलाक़ देने को तैयार हूँ,” शीतल ने कहा।
“ठीक है दे देना पर अभी खाना खा लो,” राज ने कहा।
शीतल ने कुछ नही कहा और थोड़ी देर में सो गयी। उस समय शाम के 4 बज रहे थे।
जब वो सोकर उठी तो 7 बज रहे थे। राज लैपटॉप चला रहा था। वो बिस्तर से उठी और राज के पास जाकर बैठ गयी।
“अब तुम मुझे छोड़ दोगे?”शीतल ने राज से कहा।
“नही।”
“तलाक़ के बाद भी नही।”
राज कुछ नही बोला।
“वैशाली से शादी कर लेना,”शीतल ने कहा।
“पहले तलाक़ तो होने दो,फिर दूसरी शादी के बारे में सोचेंगे,”राज ने कहा।
“शीतल चुप हो गयी।”
“क्या हुआ?” राज ने पूछा।
“कुछ नही।”
राज कुछ नही बोला और लैपटॉप में फिर से काम करने लगा।
“मैं इतने दिन जय के साथ नही थी,”शीतल ने कहा।
“जानता हूँ।”
“कैसे?”शीतल ने पूछा।
राज ने कुछ नही कहा। शीतल राज के पास से हट गयी,कुछ बर्तन रखे थे उन्हें धुलने लगी। उसके बाद उसने खाना बनाया। रात को खाना खाने के बाद राज फिर से लैपटॉप चलाने लगा और शीतल एक किताब लेकर पढ़ने लगी।
“क्या हमारा अलग होना ज़रूरी है?”राज ने पूछा।
“जबरजस्ती इस रिश्ते को निभाना भी मुश्किल है,” शीतल ने कहा।
“तलाक़ के बाद तुम कहाँ रहोगी?” राज ने पूछा।
“पता नही,पर तुम्हारे साथ नही,” शीतल ने कहा।
“जय से शादी कर लेना,तुम्हे प्यार करता है,” राज ने कहा।
“मैं नही करती।”
“क्यों?……………वो बहुत अच्छा है,तुम उसके साथ बहुत खुश रहोगी।”
“मुझे उसके साथ नही रहना।”
“फिर कहाँ रहोगी?”
“कहीं भी रहूं,तुम्हे इससे क्या?………..वैसे तुम खुश रहोगे मेरे बिना।”
“नही जानता,और तुम?”
“नही।”
“फिर भी अलग होना चाहती हो।”
“हाँ।”
“क्यों?”
“हम दोनों के लिए यही अच्छा है और फिर हम प्यार भी तो नही करते हैं।”
“पर भरोसा तो करते हैं।”
“जाने दो,राज। सब के लिए अच्छा है।”
“क्या ? सबके लिए अच्छा है।”
“हमारा अलग होना।”
“और हमारे लिए?”
“नही पता…………। पर अब मैं तुम्हे और दुख नही देना चाहती।”
“तुम मेरी पत्नी और फिर थोड़े दुख तो सबको उठाने ही पड़ते हैं।”
“जो भी हो मैं साथ नही रह सकती।”
राज शांत हो गया। शीतल के पास उसकी हर बात का जवाब था। उससे बात करने से कोई फ़ायदा नही था,वैसे भी वो जिद्दी थी किसी की कहाँ सुनती थी।
“कल से हम दूसरे घर में रहेंगे,” राज ने कहा।
“ठीक है,” शीतल ने कहा।
शीतल आँखें बंद करके लेट गयी। राज ने भी लैपटॉप बंद कर दिया। शीतल के बर्ताव में रूखापन था। वो राज पर गुस्सा नही कर रही थी लेकिन उसकी बातों में अपनापन भी नही था।
अगले दिन से दोनों नये घर में रहने लगे। वो घर बहुत बड़ा और बहुत सुंदर था किसी बंगले से कम नही था।
दो दिन बीत गये इस बीच दोनों ने एक-दूसरे कोई बात नही की। राज ने कई बार कोशिश की पर शीतल कोई बात नही करती।
शीतल और राज के तलाक़ के बारे में जय को पता चल गया था उसने तलाक़ के कागज तैयार करा लिए। जय ने शीतल के मम्मी-पापा से अपनी और शीतल की शादी की बात कर ली थी। जय ने शीतल को तलाक़ के कागज दे दिए।
“इन कागज पर तुम दोनों अपने साइन कर देना और अगले दिन तुम दोनों की कोर्ट में सुनवाई है,”जय ने शीतल से कहा।
शीतल जय से कुछ नही बोली। उसने उससे कागज लिए और घर चली आई। राज घर पर नही था। वो शाम को 7 बजे घर आया। वो बहुत थका हुआ लग रहा था इसलिए शीतल ने उससे कुछ नही कहा। सोते समय शीतल ने उसे तलाक़ के कागज पकड़ा दिए।
राज ने एक पल का समय लिए बिना उस पर साइन कर दिया। शीतल को तो यकीन ही नही हो रहा था की राज इतनी जल्दी साइन कर देगा। उसे लगा था कि शायद राज एक बार उससे बात करेगा पर राज ने तो………।
शीतल ने खुद साइन नही किए थे। राज ने साइन करके कागज वहीं मेज पर रख दिए। शीतल की हिम्मत उन्हें उठाने की नही हुई। वो आँख बंद करके लेट गयी और जब राज सो गया तब उसने उन कागज को देखा। कुछ देर देखती रही फिर बिना साइन किए सो गयी।
अगले दिन सुबह 10 बजे किसी ने घंटी बजाई उस समय राज नहा रहा था और शीतल कुछ काम रही थी। शीतल ने दरवाजा खोला बाहर जय,सुषमा,शीतल के मम्मी-पापा और राज के मम्मी-पापा खड़े थे शायद जय सब को कोर्ट चलने के लिए लेकर आया था।
“तुम अभी तक तैयार नही हुई,कोर्ट में 11 बजे पेशी है,”जय ने शीतल की अस्त-व्यस्त हालत देखकर कहा।
“मुझे कहीं नही जाना,” शीतल ने कहा।
“क्यों?” जय ने पूछा।
“बस ऐसे ही,”शीतल ने कहा।
“तलाक़ के कागज ले आओ,” जय ने कहा।
शीतल अंदर से तलाक़ के कागज ले आई। उसने कागज जय के हाथ में थमा दिए।
“तुमने साइन क्यों नही किए,” जय ने कागज देखते हुए कहा।
“मुझे तलाक़ नही देना,” शीतल ने कहा।
“क्यों?” शीतल की माँ ने कहा।
“मैं राज के साथ ही खुश हूँ,” शीतल ने कहा।
“और राज?” राज की माँ ने पूछा।
“वो भी खुश है,” शीतल ने कहा।
“तुम उसे तलाक़ क्यों नही दे रही?क्यों उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर रही हो?” शीतल की माँ ने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा।
शीतल कुछ नही बोली।
“तुम खुश नही हो ,शीतल,”जय ने कहा।
“मैं बहुत खुश हूँ,” शीतल ने कहा।
“दो दिन बाद तुम उसे फिर से छोड़ कर किसी के साथ चली जाओगी उससे अच्छा है की आज ही उसे छोड़ दो,” सुषमा ने कहा।
“तुम सब मेरे तलाक़ के पीछे क्यों पड़े हो?हम कैसे जी रहे हैं?किसी को क्या मतलब है?जब हमें मदद की ज़रूरत थी तब तो कोई नही सामने आया था,” शीतल ने कहा और उसने जय से तलाक़ के कागज लेकर उसे फाड़ दिया।
“तुम पागल तो नही हो गयी हो, शीतल तुम बहुत ग़लत कर रही हो,” जय ने कहा।
“मैं कुछ ग़लत नही कर रही हूँ बस अपने रिश्ते को टूटने से बचा रही हूँ,” शीतल ने कहा।
“तुम मुझसे प्यार करती हो तो फिर क्यों इस रिश्ते को बचाना चाहती हो?” जय ने पूछा।
शीतल को जैसे 5000 वोल्ट का करेंट लग गया हो वो एकदम से गुस्से में आ गयी।
“मैं तुमसे प्यार नही करती,” शीतल ने अपने गुस्से को दबाते हुए कहा।
“करती हो,शीतल,तभी तो तुम मेरे साथ कहीं भी चली जाती थी,मेरी हर बात मानना,मेरे साथ हँसना-बोलना ये सब क्या था? शीतल,”जय ने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा।
“हाँ शीतल,अगर तुम जय को प्यार नही करती थी तो फिर उसको इतना समय क्यों देती थी?”सुषमा ने कहा।
“मैंने कभी नही कहा की मैं जय से प्यार करती हूँ,अगर जय के साथ ज़रा सा हँस-बोल लिया तो इसका मतलब ये नही कि मैं उसे प्यार करने लगी। मैं जय को सिर्फ़ दोस्त मानती हूँ। बोलते तो हम अपने रिश्तेदारों से भी हैं इसका मतलब ये नही की हम उनसे शादी कर ले। पति की बजाय हम कई बार अपने परिवार वालों,दोस्तों को प्राथमिकता देते हैं इसका मतलब की मुझे अपने पति से प्यार नही। मुझ पर उंगलियाँ इस लिए उठ रही हैं क्योंकि मैं एक लड़की हूँ,” शीतल ने कहा।
“तुम धोखा दे रही हो शीतल,”राज के पापा ने कहा।
“किसे धोखा दे रही हूँ?मैं किसी को धोखा नही दे रही राज को सब-कुछ पता है मैं जय के साथ कहाँ गयी?उससे क्या बात की?सब कुछ। मैं राज को हर एक बात बताती हूँ फिर कैसा धोखा। हम तलाक़ नही चाहते आप सब के दबाव में हम तलाक़ देने को तैयार हुए थे,” शीतल ने कहा।
कुछ पल तक कोई कुछ नही बोला तो शीतल फिर बोली-“सुषमा तुम कहती हो की मेरी दोस्त हो,दोस्त कभी अपने दोस्त का घर नही जलाते। राज मेरी कमाई नही ख़ाता है उसने मुझे बनाया है और राज को कुछ भी कहने की तुम्हें कोई ज़रूरत नही है। सब को मेरे खिलाफ तुमने ही तो भड़काया है। ”
सुषमा कुछ नही कह सकी ना ही कोई और कुछ कह सका।
“मम्मी,मैं बदचलन नही हूँ। ना मैं राज की जिंदगी बर्बाद कर रही हूँ। 19 साल में आप मुझे इतना नही समझ सकीं जितना राज ने 6-7 महीनो में समझ लिया। अच्छा होगा आप सब यहाँ से चले जाए,” शीतल ने कहा।
“तुम राज से नही पैसों से प्यार करती हो,शीतल। जब राज के पास नही थे तो मुझसे दोस्ती और अब राज के पास पैसे हैं तो मुझे छोड़ दिया,” जय ने कहा।
“ऐसा कुछ नही है,” शीतल ने कहा।
“ऐसा ही है तभी तो दो दिन पहले तुम तलाक़ के लिए तैयार थी लेकिन इस घर में आते ही तुमने फ़ैसला बदल दिया,” राज की माँ ने कहा।
“तलाक़ ना लेने का फ़ैसला मेरा और राज दोनों का है,” शीतल ने कहा।
“तो फिर राज ने साइन क्यों किये?” जय ने कहा।
शीतल से कुछ भी बोलते नही बना वो चुप हो गयी। राज घर के अंदर से सभी की बाते सुन रहा था।
“राज तुमसे प्यार नही करता तुम जबरजस्ती उसके गले में पड़ी हो,” राज के पापा ने कहा।
राज तब तक घर के बाहर आ गया था।
“शीतल को कोई कुछ भी ना कहे,हम दोनों ने सोच समझ कर ये फ़ैसला लिया है,” राज ने कहा।
“ये तुम्हे धोखा दे रही है,” राज की माँ ने कहा।
“किसी को धोखा नही दे रही है,ना ही शीतल को पैसे चाहिए,” राज ने कहा।उस समय शीतल की नज़रें सिर्फ़ राज को देख रही थी।
“सब लोग यहाँ से जा सकते हैं,” राज ने कहा।
सब जाने लगे किसी ने कुछ नही कहा लेकिन जय नही गया।
“तुम भी जय,” शीतल ने कहा।
“मेरे सारे पैसे वापस कर देना,” जय ने कहा।
“यही था तुम्हारा प्यार,कल सारे पैसे मिल जाएँगे,”शीतल ने कहा।
जय चला गया और वो दोनों भी घर के अंदर आ गये।
“जय को कितने पैसे वापस करने हैं?” राज ने पूछा।
“3 लाख।“
“3 लाख रुपये……। तुमने कितना खर्च किया है,” राज ने पूछा।
शीतल ने कुछ नही कहा और वो नहाने चली गयी,राज टी.वी.देखने लगा।
शीतल ने भले ही तलाक़ ना दिया हो लेकिन वो अभी भी राज से ठीक से बात नही कर रही थी,वो अभी भी राज से थोड़ा कटने की कोशिश कर रही थी। राज और शीतल दोनों ने सब के सामने मान लिया था की वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन उनका ये प्यार अभी उनके रिश्ते में नही दिख रहा था।
उस दिन शाम को शीतल छत पर बैठ कर कोई नॉवेल पढ़ रही थी शायद कोई रोमांटिक नॉवेल थी,वो खुद में ही खोई हुई थी। चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट,बाल खुले हुए और लाल साड़ी में वो बहुत सुंदर लग रही थी। पहली बार उसने साड़ी पहनी थी।
“क्या पढ़ रही हो?” राज ने पूछा।
वो खुद में इतनी खोई हुई थी की उसे राज के आने का अहसास ही नही हुआ।
“कुछ नही बस ऐसे ही समय काट रही थी,” शीतल ने किताब बंद करते हुए बोला और उठ कर नीचे जाने लगी।
“नीचे क्यों जा रही हो?” राज ने उसे रोकने के प्रयास से पूछा।
शीतल बिना कुछ कहे वापस उसी जगह बैठ गयी,उसकी नज़रें उस किताब पर ही थी शायद उसमें कुछ रखा हुआ था जिसे वो राज से छुपाना चाहती थी।
“तुमने मुझे तलाक़ क्यों नही दिया?” राज ने पूछा।
“अब दे दें,” शीतल ने तुनककर कहा।
“नही……। प्यार करती हो मुझसे,” राज ने शीतल को छेड़ते हुए कहा।
“नही,”शीतल ने कहा।
“फिर तलाक़ क्यों नही दिया।”
शीतल कुछ नही बोली। उसका मन तो कहीं और लगा हुआ था।
“आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो ऐसे ही हमेशा मुस्कुराती रहा करो।”
शीतल कुछ नही बोली और उठ कर नीचे चली गयी राज भी उसके पीछे-पीछे नीचे आ गया।
“क्या हुआ तुम्हें?तुम मुझसे दूर हटने की कोशिश क्यों कर रही हो?” राज ने पूछा।
“मेरी तबियत नही ठीक है। मुझे अकेला छोड़ दो,” शीतल ने कहा और वो लेट गयी।
“तबियत को क्या हुआ,अभी तक तो सब ठीक था,” राज ने कहा।
“मुझे बहुत अजीब सा लग रहा है। सिर में हल्का दर्द भी हो रहा है,कुछ देर आराम करूँगी तो ठीक हो जाएगा,” शीतल ने कहा।
राज कमरे से बाहर जाने लगा की शीतल बोली-“कल जय के पैसे लौटा दोगे। ”
“हाँ,” कहकर राज कमरे से बाहर आ गया।
राज सोच रहा था की आख़िर शीतल उससे ठीक से बात क्यों नही कर रही है। वो पहले जैसे ना बहुत बोल रही है ना उसकी किसी बात का ठीक से जवाब दे रही है। कहीं वो सच में जय से तो प्यार नही करती है या फिर उसकी तबियत सच में खराब है। कहीं उसे उसकी किसी बात का बुरा तो नही लगा।
1 घंटे बाद राज वापस शीतल के कमरे में गया वो सो रही थी,राज उसके पास में बैठ कर उसके सिर पर हाथ फेरने लगा,उसकी तबियत सच में खराब थी,उसे हल्का बुखार था। राज के हाथ लगाने की वजह से उसकी नींद खुल गयी। उसने अपनी पलकें उठा कर राज की ओर देखा और फिर आँख बंद कर ली।
“दर्द कम हुआ,” राज ने पूछा।
“हाँ,अब ठीक हूँ,” शीतल ने दबी हुई आवाज़ में कहा।
राज उसके सिर पर हल्का-हल्का हाथ फिरा रहा था और शीतल आँख बंद किए लेती हुई थी। शाम के 7:45बजे थे।
“खाना बनाना है,” शीतल ने कहा,उसने शायद ये बात खुद से कही थी।
“मैं बना लूँगा,” राज ने कहा।
शीतल ने एक पल के लिए अपनी पलकें उठा कर राज की ओर देखा,उसका ध्यान कहीं और था पर नज़रें शीतल के हाथ पर थी जिसे उसने अपने दूसरे हाथ से पकड़ रखा था।
रात को दोनों ने खाना खाया और फिर लेट गये।
अगले दिन सुबह 8 बजे राज काम पर चला गया,शीतल को कहीं नही जाना था वो घर पर ही थी। उसने पूरा दिन टी.वी. देखकर बिताया। रात को राज 10बजे वापस घर आया।
“शीतल,खाना क्या बनाया है?” राज ने पूछा।
“कुछ नही,” शीतल ने कहा।
“क्यों?। तबियत ठीक नही है क्या?” राज ने पूछा।
“ठीक है,” शीतल ने कहा।
“फिर क्यों?”
“मैं कोई नौकरानी नही हूँ,” शीतल ने कहा।
“पर शीतल………” राज कुछ कहने जा रहा था पर चुप हो गया,बिना कुछ कहे लेट गया।
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उनका ये रोज़ का हो गया था,राज बाहर ही खाना ख़ाता था। शीतल घर पर कभी कुछ नही बनाती थी और अगर बनाती थी तो सिर्फ़ अपने लिए जब राज घर पर नही होता था।
राज को कई बार देर हो जाती थी, जिस वजह से उस रात वो किसी होटल नही जा पाता था और बिना कुछ खाए सो जाता था पर शीतल को कभी भी अहसास नही होने देता था की वो भूखा है। शीतल को तो जैसे राज से कोई मतलब ही नही रह गया था।
एक दिन राज को सुबह जल्दी जाना था उस दिन वो किसी होटल नही जा सका और दिन भर इतना काम था की उसे वक्त नही मिला,रात को भी उसे आते-आते 12बज गये वो होटल नही जा सका उस दिन उसने कुछ भी नही खाया था।
“आज कुछ बनाया है?” राज ने शीतल से पूछा।
“नही,और मुझसे कोई उम्मीद भी नही करना । मैं और लड़कियों की तरह नही हूँ कि अपने पति के लिए सुबह शाम खाना बनाऊँ,उनकी सेवा करूँ,” शीतल ने कहा।
“मैंने ऐसा तो कभी नही कहा तुमसे की तुम मेरे लिए कुछ करो पर इतना तो उम्मीद कर सकता हूँ कि अगर सुबह से भूखा हूँ तो तुम कुछ बना दोगी। अगर मेरे पास समय होता तो मैं कभी तुमसे कुछ नही कहता,” राज ने गुस्से में कहा।
शीतल ने राज को पहली बार इतने गुस्से में देखा था। राज से कुछ कहने की उसकी हिम्मत नही हुई,वो कुछ नही बोली। राज चुप-चाप लेट गया उसने जूते भी नही उतारे।
शीतल दूसरे कमरे में चली गयी कुछ देर बाद वो वापस आयी,राज सो रहा था,शीतल राज के पास आयी उसके जूते उतारने लगी। शीतल को इस तरह की चीज़े पसंद नही थी पर फिर भी…।
अगले दिन शीतल ने राज के काम पर जाने से पहले खाना बना दिया पर राज कुछ खाए बिना ही चला गया। शीतल ने खाने के लिए कहा लेकिन राज ने कोई जवाब नही दिया।
शीतल ने शाम को भी खाना बनाया पर राज होटल से खा कर आया था। राज के इस तरह के व्यवहार को शीतल के लिए बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था। वो खुद राज से नही बोलती थी लेकिन जब राज ने बोलना छोड़ दिया तो उसे बुरा लग रहा था। अब उसे राज की फ़िक्र होने लगी थी। बिन कहे ही वो राज के हर काम करने लगी लेकिन उसका कोई भी काम करना बेकार ही था क्यों कि राज अपना हर काम खुद ही करता था।
एक दिन राज को काम पर नही जाना था। वो घर पर ही था। उस दिन राज अपने लिए खाना खुद ही बनाने लगा।
“मैं बना दूँगी,तुम रहने दो,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला और जो कर रहा था उसे करता रहा। शीतल उसके पास आई और उससे उसने चाकू छीन ली।
“ये क्या बदतमीज़ी है?” राज ने कहा।
“मैंने कहा ना मैं बना दूँगी फिर क्यों?” शीतल ने कहा।
“तुम्हें मेरे लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नही है,”राज ने कहा।
“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ।”
“पत्नी का काम खाना बनाना नही होता,”राज ने कहा।
शीतल कुछ नही बोल सकी,कुछ दिन पहले तक तो वो खुद राज से यही कह रही थी और आज सब कुछ करने को तैयार थी।
शीतल खुद सब्जी काटने लगी। राज ने भी ज़्यादा कुछ नही कहा और खुद कुछ और करने लगा। शीतल फिर उसके पास चली आई और उसे उस काम को करने से रोक दिया।
“मैं सब कर लूँगी,तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत नही है,” शीतल ने कहा।
“तुम्हारी समस्या क्या है,शीतल?जब तुमसे अच्छे से बात करो तब तुम नखरे दिखाती हो और जब ना बोलो तो खुद……………। तुम चाहती क्या हो?कभी कहती हो की तुमसे ये सब नही होगा और कभी खुद करने लगती हो,” राज ने कहा।
“मुझे माफ़ कर दो,मुझसे ग़लती हो गयी अब दोबारा ऐसा कुछ नही करूँगी।”
“शीतल,मुझे परेशान मत करो।”
“तुम मुझसे गुस्सा मत हुआ करो,मैं तुम्हारा गुस्सा नही बर्दाश्त कर सकती,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला और जो कर रहा था उस काम को छोड़ कर कमरे में चला गया कुछ देर बाद शीतल भी उसी कमरे आ गयी।
“क्या हुआ ? अब नही बनाना,” राज ने कहा।
“बन रहा है।”
“तुम्हें हो क्या गया था ?तुम इतने दिनों से बहुत अजीब सा व्यवहार कर रही थी।”
“कुछ नही बस थोड़ी तबियत ठीक नही थी। मैं तुम्हें जान बूझ कर परेशान नही करना चाहती थी , बस हो जाता है पर तुम मुझ पर गुस्सा मत हुआ करो,मुझे मना लिया करो। तुम्हारे अलावा और कोई मुझे समझता भी तो नही है,”शीतल ने कहा।
“सॉरी,” राज ने कहा।
“मुझे कुछ पूछना है,” शीतल ने कहा।
“पूछो।”
“मेरे बिना जी लोगे,” शीतल ने कहा।
“क्यों? कहीं जा रही हो,” राज ने कहा।
“पता नही पर तुम बताओ हाँ या नही,” शीतल ने कहा।
“किसी के जाने से किसी की जिंदगी नही रुकती और तुम खुद समझ सकती हो कि मैं …………।” राज ने कहा और कमरे के बाहर चला गया।
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06-08-2020, 12:08 PM, #35
hotaks
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RE: ये कैसी दूरियाँ( एक प्रेमकहानी )
राज घायल होकर रह गया। यों लगा मानो डॉली ने सैकड़ों नश्तर उसके हृदय में उतार दिए हों। एक पल मौन रहकर वह बोला- ‘और तुम्हारा वह अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लेना-अग्नि को साक्षी करके जीवनभर साथ निभाने का वचन लेना।’
‘वह-वह भी एक धोखा था।’
‘न-न डॉली! ऐसा नहीं हो सकता। कोई भी भारतीय नारी झूठे फेरे नहीं ले सकती। हिंदुस्तान की संस्कृति में जन्मी और पली कोई भी औरत अग्नि को साक्षी मानकर झूठे वचन कभी नहीं दे सकती। तुम-तुम झूठ बोलती हो डॉली! तुम झूठ बोलती हो।’
‘यह सच है राज!’
‘सच है।’ राज उसे पागलों की भांति देखता रहा। फिर वह आगे बढ़ा और डॉली को भगवान की तस्वीर की ओर मोड़कर उसे झिंझोड़ते हुए बोला- ‘तो फिर कहो। कहो भगवान के सामने कि वह सब एक नाटक था। कहो कि तुमने झूठ कहा था। कहो कि तुम्हारी मांग में भरा यह सिंदूर मेरा न था। कहो कि तुम मेरी न थीं।
बोलो, जवाब दो डॉली!’
डॉली ने खामोशी से चेहरा झुका लिया।
उसे यों मौन देखकर राज फिर चिल्लाया ‘बोलो डॉली! बताओ। कहो कि तुम मुझे वास्तव में धोखा दे रही थीं। छल रही थीं तुम मुझे दर्द का प्याला पिला रही थीं तुम मुझे रिश्तों के नाम पर। लूट रही थीं तुम मुझे।’ कहते-कहते राज की आवाज रुंध गई और आंखों में आंसुओं की बूंदें झिलमिला उठीं। डॉली ने फिर भी कुछ न कहा।
राज ने उसे छोड़ दिया और दर्द भरे अंदाज में बोला- ‘और यदि यह सच है। यह सच है तो तुमने ठीक न किया डॉली! इससे तो बेहतर था कि तुम मुझे विष देकर मार डालतीं। छुरा उतार देतीं मेरे हृदय में। या फिर उसी वक्त दूर चली जातीं मेरे जीवन से। कम-से-कम इतनी पीड़ाएं तो न मिलतीं मुझे। वो गम जिसे भुलाने के लिए मैंने तुम्हारा सहारा लिया। वो अतीत जिसे भूलने के लिए मैंने तुम्हारे आंचल में मुंह छुपाया-आज इतनी बड़ी चोट तो न देता मुझे।’ राज इससे अधिक न कह सका और आंसुओं को रोकने के लिए अपने होंठों को काटने लगा।
डॉली कुछ क्षणों तक तो वहां खड़ी अपने ही विचारों से लड़ती रही। फिर वह मुड़ी और कमरे से बाहर चली गई।
राज अपनी आंखें पोंछता रहा।
कुछ देर बाद हर कोई चला गया रह गये तो शीतल और राज। किसी ने एक बार भी ये नही पूछा की वो कहाँ गयी थी,कहीं किसी मुसीबत में तो नही थी बस सब ने अपना गुस्सा उस पर निकल दिया। राज उसके करीब आया उसने उसे अपने सीने से लगा लिया जैसे कोई किसी को दिलासा देने के लिए करता है। शीतल अपने आँसू को नही रोक पाई सबके जाते ही वो रोने लगी।
“चुप हो जाओ शीतल,किसी की बात का बुरा मत मानो,” राज ने कहा।
शीतल तो जैसे कहीं खो सी गयी थी उसे होश ही नही था। राज उसे अपने सहारे बेड के पास ले गया और उसे बेड पे बिठाया।
“शांत हो जाओ लोग तो कहते ही रहते इसका मतलब ये नही की तुम ग़लत हो,” राज ने कहा।
“तुम्हें मुझ पर विश्वास नही रहा,” शीतल ने खुद को संभालते हुए कहा और राज से दूर हट गयी।
“मैंने कुछ कहा,” राज बोला।
“इसी का तो अफ़सोस है कि तुमने किसी से कुछ नही कहा,” शीतल ने कहा और अपना मुँह तकिये से छुपा कर लेट गयी।
“कुछ खा लो तुम्हें भूख लगी होगी,” राज ने कहा।
“नही लगी है।”
“कुछ तो खा लो।”
शीतल ने कोई जवाब नही दिया। राज ने फिर कहा-“खा लो…। ”
ठीक उसी तरह से जैसे शीतल राज से कहती थी पर शीतल जिद्दी थी वो मानने वालों में नही थी।
“मैं तुम्हे तलाक़ देने को तैयार हूँ,” शीतल ने कहा।
“ठीक है दे देना पर अभी खाना खा लो,” राज ने कहा।
शीतल ने कुछ नही कहा और थोड़ी देर में सो गयी। उस समय शाम के 4 बज रहे थे।
जब वो सोकर उठी तो 7 बज रहे थे। राज लैपटॉप चला रहा था। वो बिस्तर से उठी और राज के पास जाकर बैठ गयी।
“अब तुम मुझे छोड़ दोगे?”शीतल ने राज से कहा।
“नही।”
“तलाक़ के बाद भी नही।”
राज कुछ नही बोला।
“वैशाली से शादी कर लेना,”शीतल ने कहा।
“पहले तलाक़ तो होने दो,फिर दूसरी शादी के बारे में सोचेंगे,”राज ने कहा।
“शीतल चुप हो गयी।”
“क्या हुआ?” राज ने पूछा।
“कुछ नही।”
राज कुछ नही बोला और लैपटॉप में फिर से काम करने लगा।
“मैं इतने दिन जय के साथ नही थी,”शीतल ने कहा।
“जानता हूँ।”
“कैसे?”शीतल ने पूछा।
राज ने कुछ नही कहा। शीतल राज के पास से हट गयी,कुछ बर्तन रखे थे उन्हें धुलने लगी। उसके बाद उसने खाना बनाया। रात को खाना खाने के बाद राज फिर से लैपटॉप चलाने लगा और शीतल एक किताब लेकर पढ़ने लगी।
“क्या हमारा अलग होना ज़रूरी है?”राज ने पूछा।
“जबरजस्ती इस रिश्ते को निभाना भी मुश्किल है,” शीतल ने कहा।
“तलाक़ के बाद तुम कहाँ रहोगी?” राज ने पूछा।
“पता नही,पर तुम्हारे साथ नही,” शीतल ने कहा।
“जय से शादी कर लेना,तुम्हे प्यार करता है,” राज ने कहा।
“मैं नही करती।”
“क्यों?……………वो बहुत अच्छा है,तुम उसके साथ बहुत खुश रहोगी।”
“मुझे उसके साथ नही रहना।”
“फिर कहाँ रहोगी?”
“कहीं भी रहूं,तुम्हे इससे क्या?………..वैसे तुम खुश रहोगे मेरे बिना।”
“नही जानता,और तुम?”
“नही।”
“फिर भी अलग होना चाहती हो।”
“हाँ।”
“क्यों?”
“हम दोनों के लिए यही अच्छा है और फिर हम प्यार भी तो नही करते हैं।”
“पर भरोसा तो करते हैं।”
“जाने दो,राज। सब के लिए अच्छा है।”
“क्या ? सबके लिए अच्छा है।”
“हमारा अलग होना।”
“और हमारे लिए?”
“नही पता…………। पर अब मैं तुम्हे और दुख नही देना चाहती।”
“तुम मेरी पत्नी और फिर थोड़े दुख तो सबको उठाने ही पड़ते हैं।”
“जो भी हो मैं साथ नही रह सकती।”
राज शांत हो गया। शीतल के पास उसकी हर बात का जवाब था। उससे बात करने से कोई फ़ायदा नही था,वैसे भी वो जिद्दी थी किसी की कहाँ सुनती थी।
“कल से हम दूसरे घर में रहेंगे,” राज ने कहा।
“ठीक है,” शीतल ने कहा।
शीतल आँखें बंद करके लेट गयी। राज ने भी लैपटॉप बंद कर दिया। शीतल के बर्ताव में रूखापन था। वो राज पर गुस्सा नही कर रही थी लेकिन उसकी बातों में अपनापन भी नही था।
अगले दिन से दोनों नये घर में रहने लगे। वो घर बहुत बड़ा और बहुत सुंदर था किसी बंगले से कम नही था।
दो दिन बीत गये इस बीच दोनों ने एक-दूसरे कोई बात नही की। राज ने कई बार कोशिश की पर शीतल कोई बात नही करती।
शीतल और राज के तलाक़ के बारे में जय को पता चल गया था उसने तलाक़ के कागज तैयार करा लिए। जय ने शीतल के मम्मी-पापा से अपनी और शीतल की शादी की बात कर ली थी। जय ने शीतल को तलाक़ के कागज दे दिए।
“इन कागज पर तुम दोनों अपने साइन कर देना और अगले दिन तुम दोनों की कोर्ट में सुनवाई है,”जय ने शीतल से कहा।
शीतल जय से कुछ नही बोली। उसने उससे कागज लिए और घर चली आई। राज घर पर नही था। वो शाम को 7 बजे घर आया। वो बहुत थका हुआ लग रहा था इसलिए शीतल ने उससे कुछ नही कहा। सोते समय शीतल ने उसे तलाक़ के कागज पकड़ा दिए।
राज ने एक पल का समय लिए बिना उस पर साइन कर दिया। शीतल को तो यकीन ही नही हो रहा था की राज इतनी जल्दी साइन कर देगा। उसे लगा था कि शायद राज एक बार उससे बात करेगा पर राज ने तो………।
शीतल ने खुद साइन नही किए थे। राज ने साइन करके कागज वहीं मेज पर रख दिए। शीतल की हिम्मत उन्हें उठाने की नही हुई। वो आँख बंद करके लेट गयी और जब राज सो गया तब उसने उन कागज को देखा। कुछ देर देखती रही फिर बिना साइन किए सो गयी।
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06-08-2020, 12:09 PM, #38
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RE: ये कैसी दूरियाँ( एक प्रेमकहानी )
अगले दिन सुबह 10 बजे किसी ने घंटी बजाई उस समय राज नहा रहा था और शीतल कुछ काम रही थी। शीतल ने दरवाजा खोला बाहर जय,सुषमा,शीतल के मम्मी-पापा और राज के मम्मी-पापा खड़े थे शायद जय सब को कोर्ट चलने के लिए लेकर आया था।
“तुम अभी तक तैयार नही हुई,कोर्ट में 11 बजे पेशी है,”जय ने शीतल की अस्त-व्यस्त हालत देखकर कहा।
“मुझे कहीं नही जाना,” शीतल ने कहा।
“क्यों?” जय ने पूछा।
“बस ऐसे ही,”शीतल ने कहा।
“तलाक़ के कागज ले आओ,” जय ने कहा।
शीतल अंदर से तलाक़ के कागज ले आई। उसने कागज जय के हाथ में थमा दिए।
“तुमने साइन क्यों नही किए,” जय ने कागज देखते हुए कहा।
“मुझे तलाक़ नही देना,” शीतल ने कहा।
“क्यों?” शीतल की माँ ने कहा।
“मैं राज के साथ ही खुश हूँ,” शीतल ने कहा।
“और राज?” राज की माँ ने पूछा।
“वो भी खुश है,” शीतल ने कहा।
“तुम उसे तलाक़ क्यों नही दे रही?क्यों उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर रही हो?” शीतल की माँ ने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा।
शीतल कुछ नही बोली।
“तुम खुश नही हो ,शीतल,”जय ने कहा।
“मैं बहुत खुश हूँ,” शीतल ने कहा।
“दो दिन बाद तुम उसे फिर से छोड़ कर किसी के साथ चली जाओगी उससे अच्छा है की आज ही उसे छोड़ दो,” सुषमा ने कहा।
“तुम सब मेरे तलाक़ के पीछे क्यों पड़े हो?हम कैसे जी रहे हैं?किसी को क्या मतलब है?जब हमें मदद की ज़रूरत थी तब तो कोई नही सामने आया था,” शीतल ने कहा और उसने जय से तलाक़ के कागज लेकर उसे फाड़ दिया।
“तुम पागल तो नही हो गयी हो, शीतल तुम बहुत ग़लत कर रही हो,” जय ने कहा।
“मैं कुछ ग़लत नही कर रही हूँ बस अपने रिश्ते को टूटने से बचा रही हूँ,” शीतल ने कहा।
“तुम मुझसे प्यार करती हो तो फिर क्यों इस रिश्ते को बचाना चाहती हो?” जय ने पूछा।
शीतल को जैसे 5000 वोल्ट का करेंट लग गया हो वो एकदम से गुस्से में आ गयी।
“मैं तुमसे प्यार नही करती,” शीतल ने अपने गुस्से को दबाते हुए कहा।
“करती हो,शीतल,तभी तो तुम मेरे साथ कहीं भी चली जाती थी,मेरी हर बात मानना,मेरे साथ हँसना-बोलना ये सब क्या था? शीतल,”जय ने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा।
“हाँ शीतल,अगर तुम जय को प्यार नही करती थी तो फिर उसको इतना समय क्यों देती थी?”सुषमा ने कहा।
“मैंने कभी नही कहा की मैं जय से प्यार करती हूँ,अगर जय के साथ ज़रा सा हँस-बोल लिया तो इसका मतलब ये नही कि मैं उसे प्यार करने लगी। मैं जय को सिर्फ़ दोस्त मानती हूँ। बोलते तो हम अपने रिश्तेदारों से भी हैं इसका मतलब ये नही की हम उनसे शादी कर ले। पति की बजाय हम कई बार अपने परिवार वालों,दोस्तों को प्राथमिकता देते हैं इसका मतलब की मुझे अपने पति से प्यार नही। मुझ पर उंगलियाँ इस लिए उठ रही हैं क्योंकि मैं एक लड़की हूँ,” शीतल ने कहा।
“तुम धोखा दे रही हो शीतल,”राज के पापा ने कहा।
“किसे धोखा दे रही हूँ?मैं किसी को धोखा नही दे रही राज को सब-कुछ पता है मैं जय के साथ कहाँ गयी?उससे क्या बात की?सब कुछ। मैं राज को हर एक बात बताती हूँ फिर कैसा धोखा। हम तलाक़ नही चाहते आप सब के दबाव में हम तलाक़ देने को तैयार हुए थे,” शीतल ने कहा।
कुछ पल तक कोई कुछ नही बोला तो शीतल फिर बोली-“सुषमा तुम कहती हो की मेरी दोस्त हो,दोस्त कभी अपने दोस्त का घर नही जलाते। राज मेरी कमाई नही ख़ाता है उसने मुझे बनाया है और राज को कुछ भी कहने की तुम्हें कोई ज़रूरत नही है। सब को मेरे खिलाफ तुमने ही तो भड़काया है। ”
सुषमा कुछ नही कह सकी ना ही कोई और कुछ कह सका।
“मम्मी,मैं बदचलन नही हूँ। ना मैं राज की जिंदगी बर्बाद कर रही हूँ। 19 साल में आप मुझे इतना नही समझ सकीं जितना राज ने 6-7 महीनो में समझ लिया। अच्छा होगा आप सब यहाँ से चले जाए,” शीतल ने कहा।
“तुम राज से नही पैसों से प्यार करती हो,शीतल। जब राज के पास नही थे तो मुझसे दोस्ती और अब राज के पास पैसे हैं तो मुझे छोड़ दिया,” जय ने कहा।
“ऐसा कुछ नही है,” शीतल ने कहा।
“ऐसा ही है तभी तो दो दिन पहले तुम तलाक़ के लिए तैयार थी लेकिन इस घर में आते ही तुमने फ़ैसला बदल दिया,” राज की माँ ने कहा।
“तलाक़ ना लेने का फ़ैसला मेरा और राज दोनों का है,” शीतल ने कहा।
“तो फिर राज ने साइन क्यों किये?” जय ने कहा।
शीतल से कुछ भी बोलते नही बना वो चुप हो गयी। राज घर के अंदर से सभी की बाते सुन रहा था।
“राज तुमसे प्यार नही करता तुम जबरजस्ती उसके गले में पड़ी हो,” राज के पापा ने कहा।
राज तब तक घर के बाहर आ गया था।
“शीतल को कोई कुछ भी ना कहे,हम दोनों ने सोच समझ कर ये फ़ैसला लिया है,” राज ने कहा।
“ये तुम्हे धोखा दे रही है,” राज की माँ ने कहा।
“किसी को धोखा नही दे रही है,ना ही शीतल को पैसे चाहिए,” राज ने कहा।
उस समय शीतल की नज़रें सिर्फ़ राज को देख रही थी।
“सब लोग यहाँ से जा सकते हैं,” राज ने कहा।
सब जाने लगे किसी ने कुछ नही कहा लेकिन जय नही गया।
“तुम भी जय,” शीतल ने कहा।
“मेरे सारे पैसे वापस कर देना,” जय ने कहा।
“यही था तुम्हारा प्यार,कल सारे पैसे मिल जाएँगे,”शीतल ने कहा।
जय चला गया और वो दोनों भी घर के अंदर आ गये।
“जय को कितने पैसे वापस करने हैं?” राज ने पूछा।
“3 लाख।“
“3 लाख रुपये……। तुमने कितना खर्च किया है,” राज ने पूछा।
शीतल ने कुछ नही कहा और वो नहाने चली गयी,राज टी.वी.देखने लगा।
शीतल ने भले ही तलाक़ ना दिया हो लेकिन वो अभी भी राज से ठीक से बात नही कर रही थी,वो अभी भी राज से थोड़ा कटने की कोशिश कर रही थी। राज और शीतल दोनों ने सब के सामने मान लिया था की वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन उनका ये प्यार अभी उनके रिश्ते में नही दिख रहा था।
उस दिन शाम को शीतल छत पर बैठ कर कोई नॉवेल पढ़ रही थी शायद कोई रोमांटिक नॉवेल थी,वो खुद में ही खोई हुई थी। चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट,बाल खुले हुए और लाल साड़ी में वो बहुत सुंदर लग रही थी। पहली बार उसने साड़ी पहनी थी।
“क्या पढ़ रही हो?” राज ने पूछा।
वो खुद में इतनी खोई हुई थी की उसे राज के आने का अहसास ही नही हुआ।
“कुछ नही बस ऐसे ही समय काट रही थी,” शीतल ने किताब बंद करते हुए बोला और उठ कर नीचे जाने लगी।
“नीचे क्यों जा रही हो?” राज ने उसे रोकने के प्रयास से पूछा।
शीतल बिना कुछ कहे वापस उसी जगह बैठ गयी,उसकी नज़रें उस किताब पर ही थी शायद उसमें कुछ रखा हुआ था जिसे वो राज से छुपाना चाहती थी।
“तुमने मुझे तलाक़ क्यों नही दिया?” राज ने पूछा।
“अब दे दें,” शीतल ने तुनककर कहा।
“नही……। प्यार करती हो मुझसे,” राज ने शीतल को छेड़ते हुए कहा।
“नही,”शीतल ने कहा।
“फिर तलाक़ क्यों नही दिया।”
शीतल कुछ नही बोली। उसका मन तो कहीं और लगा हुआ था।
“आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो ऐसे ही हमेशा मुस्कुराती रहा करो।”
शीतल कुछ नही बोली और उठ कर नीचे चली गयी राज भी उसके पीछे-पीछे नीचे आ गया।
“क्या हुआ तुम्हें?तुम मुझसे दूर हटने की कोशिश क्यों कर रही हो?” राज ने पूछा।
“मेरी तबियत नही ठीक है। मुझे अकेला छोड़ दो,” शीतल ने कहा और वो लेट गयी।
“तबियत को क्या हुआ,अभी तक तो सब ठीक था,” राज ने कहा।
“मुझे बहुत अजीब सा लग रहा है। सिर में हल्का दर्द भी हो रहा है,कुछ देर आराम करूँगी तो ठीक हो जाएगा,” शीतल ने कहा।
राज कमरे से बाहर जाने लगा की शीतल बोली-“कल जय के पैसे लौटा दोगे। ”
“हाँ,” कहकर राज कमरे से बाहर आ गया।
राज सोच रहा था की आख़िर शीतल उससे ठीक से बात क्यों नही कर रही है। वो पहले जैसे ना बहुत बोल रही है ना उसकी किसी बात का ठीक से जवाब दे रही है। कहीं वो सच में जय से तो प्यार नही करती है या फिर उसकी तबियत सच में खराब है। कहीं उसे उसकी किसी बात का बुरा तो नही लगा।
1 घंटे बाद राज वापस शीतल के कमरे में गया वो सो रही थी,राज उसके पास में बैठ कर उसके सिर पर हाथ फेरने लगा,उसकी तबियत सच में खराब थी,उसे हल्का बुखार था। राज के हाथ लगाने की वजह से उसकी नींद खुल गयी। उसने अपनी पलकें उठा कर राज की ओर देखा और फिर आँख बंद कर ली।
“दर्द कम हुआ,” राज ने पूछा।
“हाँ,अब ठीक हूँ,” शीतल ने दबी हुई आवाज़ में कहा।
राज उसके सिर पर हल्का-हल्का हाथ फिरा रहा था और शीतल आँख बंद किए लेती हुई थी। शाम के 7:45बजे थे।“खाना बनाना है,” शीतल ने कहा,उसने शायद ये बात खुद से कही थी।
“मैं बना लूँगा,” राज ने कहा।
शीतल ने एक पल के लिए अपनी पलकें उठा कर राज की ओर देखा,उसका ध्यान कहीं और था पर नज़रें शीतल के हाथ पर थी जिसे उसने अपने दूसरे हाथ से पकड़ रखा था।
रात को दोनों ने खाना खाया और फिर लेट गये।
अगले दिन सुबह 8 बजे राज काम पर चला गया,शीतल को कहीं नही जाना था वो घर पर ही थी। उसने पूरा दिन टी.वी. देखकर बिताया। रात को राज 10बजे वापस घर आया।
“शीतल,खाना क्या बनाया है?” राज ने पूछा।
“कुछ नही,” शीतल ने कहा।
“क्यों?। तबियत ठीक नही है क्या?” राज ने पूछा।
“ठीक है,” शीतल ने कहा।
“फिर क्यों?”
“मैं कोई नौकरानी नही हूँ,” शीतल ने कहा।
“पर शीतल………” राज कुछ कहने जा रहा था पर चुप हो गया,बिना कुछ कहे लेट गया।
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उनका ये रोज़ का हो गया था,राज बाहर ही खाना ख़ाता था। शीतल घर पर कभी कुछ नही बनाती थी और अगर बनाती थी तो सिर्फ़ अपने लिए जब राज घर पर नही होता था।
राज को कई बार देर हो जाती थी, जिस वजह से उस रात वो किसी होटल नही जा पाता था और बिना कुछ खाए सो जाता था पर शीतल को कभी भी अहसास नही होने देता था की वो भूखा है। शीतल को तो जैसे राज से कोई मतलब ही नही रह गया था।
एक दिन राज को सुबह जल्दी जाना था उस दिन वो किसी होटल नही जा सका और दिन भर इतना काम था की उसे वक्त नही मिला,रात को भी उसे आते-आते 12बज गये वो होटल नही जा सका उस दिन उसने कुछ भी नही खाया था।
“आज कुछ बनाया है?” राज ने शीतल से पूछा।
“नही,और मुझसे कोई उम्मीद भी नही करना । मैं और लड़कियों की तरह नही हूँ कि अपने पति के लिए सुबह शाम खाना बनाऊँ,उनकी सेवा करूँ,” शीतल ने कहा।
“मैंने ऐसा तो कभी नही कहा तुमसे की तुम मेरे लिए कुछ करो पर इतना तो उम्मीद कर सकता हूँ कि अगर सुबह से भूखा हूँ तो तुम कुछ बना दोगी। अगर मेरे पास समय होता तो मैं कभी तुमसे कुछ नही कहता,” राज ने गुस्से में कहा।
शीतल ने राज को पहली बार इतने गुस्से में देखा था। राज से कुछ कहने की उसकी हिम्मत नही हुई,वो कुछ नही बोली। राज चुप-चाप लेट गया उसने जूते भी नही उतारे।
शीतल दूसरे कमरे में चली गयी कुछ देर बाद वो वापस आयी,राज सो रहा था,शीतल राज के पास आयी उसके जूते उतारने लगी। शीतल को इस तरह की चीज़े पसंद नही थी पर फिर भी…।
अगले दिन शीतल ने राज के काम पर जाने से पहले खाना बना दिया पर राज कुछ खाए बिना ही चला गया। शीतल ने खाने के लिए कहा लेकिन राज ने कोई जवाब नही दिया।
शीतल ने शाम को भी खाना बनाया पर राज होटल से खा कर आया था। राज के इस तरह के व्यवहार को शीतल के लिए बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था। वो खुद राज से नही बोलती थी लेकिन जब राज ने बोलना छोड़ दिया तो उसे बुरा लग रहा था। अब उसे राज की फ़िक्र होने लगी थी। बिन कहे ही वो राज के हर काम करने लगी लेकिन उसका कोई भी काम करना बेकार ही था क्यों कि राज अपना हर काम खुद ही करता था।
एक दिन राज को काम पर नही जाना था। वो घर पर ही था। उस दिन राज अपने लिए खाना खुद ही बनाने लगा।
“मैं बना दूँगी,तुम रहने दो,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला और जो कर रहा था उसे करता रहा। शीतल उसके पास आई और उससे उसने चाकू छीन ली।
“ये क्या बदतमीज़ी है?” राज ने कहा।
“मैंने कहा ना मैं बना दूँगी फिर क्यों?” शीतल ने कहा।
“तुम्हें मेरे लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नही है,”राज ने कहा।
“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ।”
“पत्नी का काम खाना बनाना नही होता,”राज ने कहा।
शीतल कुछ नही बोल सकी,कुछ दिन पहले तक तो वो खुद राज से यही कह रही थी और आज सब कुछ करने को तैयार थी।
शीतल खुद सब्जी काटने लगी। राज ने भी ज़्यादा कुछ नही कहा और खुद कुछ और करने लगा। शीतल फिर उसके पास चली आई और उसे उस काम को करने से रोक दिया।
“मैं सब कर लूँगी,तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत नही है,” शीतल ने कहा।
“तुम्हारी समस्या क्या है,शीतल?जब तुमसे अच्छे से बात करो तब तुम नखरे दिखाती हो और जब ना बोलो तो खुद……………। तुम चाहती क्या हो?कभी कहती हो की तुमसे ये सब नही होगा और कभी खुद करने लगती हो,” राज ने कहा।
“मुझे माफ़ कर दो,मुझसे ग़लती हो गयी अब दोबारा ऐसा कुछ नही करूँगी।”
“शीतल,मुझे परेशान मत करो।”
“तुम मुझसे गुस्सा मत हुआ करो,मैं तुम्हारा गुस्सा नही बर्दाश्त कर सकती,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला और जो कर रहा था उस काम को छोड़ कर कमरे में चला गया कुछ देर बाद शीतल भी उसी कमरे आ गयी।
“क्या हुआ ? अब नही बनाना,” राज ने कहा।
“बन रहा है।”
“तुम्हें हो क्या गया था ?तुम इतने दिनों से बहुत अजीब सा व्यवहार कर रही थी।”
“कुछ नही बस थोड़ी तबियत ठीक नही थी। मैं तुम्हें जान बूझ कर परेशान नही करना चाहती थी , बस हो जाता है पर तुम मुझ पर गुस्सा मत हुआ करो,मुझे मना लिया करो। तुम्हारे अलावा और कोई मुझे समझता भी तो नही है,”शीतल ने कहा।
“सॉरी,” राज ने कहा।
“मुझे कुछ पूछना है,” शीतल ने कहा।
“पूछो।”
“मेरे बिना जी लोगे,” शीतल ने कहा।
“क्यों? कहीं जा रही हो,” राज ने कहा।
“पता नही पर तुम बताओ हाँ या नही,” शीतल ने कहा।
“किसी के जाने से किसी की जिंदगी नही रुकती और तुम खुद समझ सकती हो कि मैं …………।” राज ने कहा और कमरे के बाहर चला गया।
रात को राज जल्दी सो गया पर शीतल की आँखों में नींद नही थी उसने फिर से उसी नॉवेल को उठाया(जिसे उस दिन वो छत पर पढ़ रही थी) और उसमें से एक पेज निकाल कर पढ़ने लगी वो राज का लिखा हुआ खत था जो उसने उसे तलाक़ वाली घटना के पहले लिखा था। खत में लिखा था-
“प्यारी शीतल ,
कल तलाक़ के बाद हम दोनों जुदा हो जाएँगे। क्या पता फिर कभी कुछ कहने का मौका मिले या फिर ना मिले इसलिए ये खत ये तुम्हे लिख रहा हूँ। उस दिन घर छोड़ कर तुम मेरे पास कितने विश्वास के साथ आयी थी। तुम्हारा साथ देना नही चाहता था ना ही तुम्हारे लिए मैं कभी घर छोड़ता लेकिन तुम्हारा मुझ पर आँख बंद करके भरोसा करना मुझे अच्छा लगा था। मुझे घर छोड़ने का अफ़सोस होता लेकिन तुम्हारे साथ का अहसास ज़्यादा अच्छा है। जब तुम रोती हो,ज़िद करती हो, मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आता है लेकिन तुम्हें प्यार से शांत कराना मुझे ज़्यादा अच्छा लगता है। बिल्कुल बच्चों की तरह ज़िद करती हो और उतनी ही मासूम भी लगती हो। मुझे तुमसे रूठना और तुम्हें मनाना बहुत अच्छा लगता है। उस दिन जब तुमसे गुस्सा था और खाना नही खा रहा था तो कितनी मासूमियत से तुम मुझे मना रही थी। मैं खाना खाना तो नही चाहता था लेकिन तुम्हारा उदास चेहरा भी मुझसे नही देखा जा रहा था। तुम मुझे हमेशा हसती-बोलती हुई ही अच्छी लगती हो। कभी उदास मत रहा करो,जब तुम उदास होती हो मुझे बहुत दुख होता है। जब तुमने मुझसे कहा था कि-“तुम्हारा हर गिफ्ट मेरे लिए खास है। ” उस पल मेरा दिल कह रहा था कि अभी तुम्हारे माथे को चूम लूँ और कह दूँ कि मेरे लिए तो सिर्फ़ तुम खास हो पर कुछ कह नही सका था। मैं किसी वैशाली से प्यार नही करता हूँ, वो सिर्फ़ मेरी दोस्त थी और कुछ नही। जब से तलाक़ की बात हुई है तब से तुम्हें हर पल खोने का डर लगा रहता है। तलाक़ देना तो नही चाहता था लेकिन साइन करने के लिए तुमने कहा था तुम्हें मना भी तो नही कर सकता था और फिर साथ देने का वादा तुम्हारा था मैंने कोई वादा नही किया था। हमेशा तुमसे दूर जाने की कोशिश की। कभी भी तुम्हें जाहिर नही होने दिया कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ,ना आज कहने की हिम्मत है। शीतल,मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है,हर वक्त,हर कदम पर। कल अलग हो जाओगी मुझसे लेकिन अपने हाथों से मेरी दी हुई उस अंगूठी को अलग मत करना।
तुम्हारा पति राज”
खत पढ़ते-पढ़ते शीतल की आँखें नम हो गयी पर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। कुछ पाने की खुशी थी। इस खत को शीतल कई बार पढ़ चुकी थी।
उसने अपनी डायरी ली उसमें कुछ लिखा और फिर सो गयी। कुछ दिन में उनके बीच की दूरियाँ थोड़ी कम हो गयी।
“आज किसी होटल में खाना खाने चले,” शीतल ने राज से कहा। रात का समय था राज उस समय कुछ पेपर पर काम कर रहा था।
“किस होटल में?” राज ने पूछा।
“किसी पाँच सितारा होटल में।”
राज कुछ नही बोला करीब 1 घंटे बाद दोनों किसी होटल में एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे थे।
“लखनऊ चलोगे?शीतल ने पूछा।”
“कब?”
“अभी।”
“किस लिए?”
“मुझे अपनी बेटी से मिलना है,” शीतल ने कहा।
“अपनी……………।”
“एक अनाथालय में रहती है,ढाई साल की है,” शीतल ने कहा।
राज उसके साथ उसी समय अपनी कार से लखनऊ की ओर चल दिया,उन लोगों ने उस बच्ची को गोद ले लिया। बहुत प्यारी बच्ची थी,गौरी नाम था।
गौरी के आते ही जैसे उनकी ज़िंदगी में खुशियाँ भर गयी। शीतल और राज की लड़ाई भी ख़त्म हो गयी। दोनों कहीं से भी आते तो गौरी को खिलाने लगते वो थी कुछ ऐसी की उसे देखकर किसी को भी उसे खिलाने का मन करने लगे।
एक दिन वो तीनों किसी होटल में खाना खाने गये। वो लोग खाना खा ही रहे थे की तभी उनके पास एक लड़का आकर खड़ा हो गया। उसने किसी से कुछ बोला नही। राज कुछ कहता इससे पहले शीतल बोल पड़ी-“अरे सतीश तुम……। कैसे हो?”
“ठीक हूँ। और तुम बताओ।”
“मैं अच्छी हूँ,ये मेरे पति हैं और ये शरारती बच्ची मेरी बेटी,” शीतल ने सतीश को राज और गौरी से मिलाते हुए कहा।
“तुम दोनों आपस में बात करो मैं बाहर तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ,” राज ने कहा और वो गौरी को गोद में उठा कर बाहर चला गया।
“तुमने इतनी जल्दी शादी कर ली,क्या घर का ज़्यादा दबाव था?”
“नही,मैंने कोर्ट मैरिज की है।”
“क्यों कितना प्यार हो गया था?”
“प्यार नही हुआ था सिर्फ़ शादी हुई थी,और तुम बताओ क्या कर रहे हो?”
“बी.टेक………। तुमने पढ़ाई छोड़ दी?”
“नही,तुम कल मेरे घर आना तब बात करते हैं,मुझे तुमसे बहुत बात करनी है,” शीतल ने उसे अपने घर का पता लिख कर दे दिया।
अगले दिन सुबह काम पर जाते समय राज ने शीतल से पूछा-“कल जो मिला था वो कौन है?”
“मेरा दोस्त है,सतीश,मेरे साथ पढ़ता था।”
राज कुछ नही बोला।
“सतीश मुझे बहुत प्यार करता था।”
“और तुम।”
“शायद मैं भी,उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। पर किस्मत देखो वो मुझे इतना प्यार करता था फिर भी मैं उसे नही मिली और जिसे मिली,वो मुझे प्यार नही करता था।”
“करता तो हूँ।”
“अब करते हो,पहले से नही। वो मुझे बहुत पहले से प्यार करता था। जितना तुमने मेरे साथ किया है उतना सतीश भी मेरे लिए करता।”
राज कुछ नही बोला चुप-चाप चला गया।
शाम को सतीश घर आया। राज उस समय घर पर नही था।
“तुमने इतनी जल्दी शादी क्यों की?” सतीश ने पूछा।
“कुछ हालात ही ऐसे हो गये थे की मुझे शादी करनी पड़ी।”
“क्या हुआ था?”
“बताती हूँ ,” कहकर शीतल ने शुरू से अंत तक की सारी कहानी सुना दी की कैसे वो राज से मिली?उसकी शादी कैसे हुई?उसने क्या कुछ सहा?सब कुछ उसने सतीश से कह दिया।
शीतल की कहानी सुन कर सतीश की आँखों में आँसू आ गये।
“तुम इतना सब कुछ अकेले सह रही थी।”
“नही,राज का साथ था।”
“क्या कोई इतना अच्छा हो सकता है?”
“पता नही,पर राज है।”
कुछ देर तक दोनों चुप रहे फिर सतीश जाने लगा,तभी राज आ गया पर सतीश राज से बिना कुछ बोले ही चला गया।
“सतीश, क्यों आया था?”राज ने पूछा।
“मुझसे मिलने।”
“थोड़ा दूर रहो इससे।”
“क्यों?तुम्हे वो पसंद नही या मुझ पर भरोसा नही।”
“कोशिश करो आज के बाद ना मिलने की।”
इतना कहकर राज गौरी के साथ खेलने लगा। शीतल भी कुछ नही बोली।
अगले दिन राज के जाने के कुछ देर बाद ही सतीश शीतल से मिलने के लिए आया। शीतल को उसके इस तरह आने की कोई उम्मीद नही थी।
“तुम इतनी सुबह।”
“मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”
“बोलो।”
“अंदर बैठ कर बात करें।”
शीतल उसे मना नही कर पायी,बेमन से उसने उसे अंदर आने के लिए कहा।
“कहो,क्या बात करनी है?”
“शीतल , राज तुम्हें धोखा दे रहा।”
“कोई भी बात करो पर राज के बारे में कुछ नही।”
“मुझे सिर्फ़ राज के बारे में ही बात करनी है।”
“तो फिर जा सकते हो।”
“शीतल , राज ने ही तुम्हारी जिंदगी बर्बाद की है। वो अच्छा नही है।”
“कैसा भी हो ,कुछ भी किया हो मुझे कुछ नही जानना,तुम जाओ यहाँ से,”शीतल ने कहा।
“जय,राज का दोस्त है और उसके पास इतने पैसे अचानक नही आए हैं,सब कुछ उसके पास पहले से था। तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ है वो इत्तेफ़ाक नही था बल्कि राज की चाल थी,” सतीश ने कहा और चला गया।
कुछ देर बाद राज घर आया तो उसने देखा की शीतल सोफे पर बेहोश पड़ी है उसके मुँह से झाग निकल रहा था। वो उसे तुरन्त हॉस्पिटल लेकर गया। शीतल के लिए राज की आँखों में पहली बार आँसू आए थे।
राज को कुछ समझ नही आया की शीतल ने ऐसा क्यों किया। दो दिन हो गये,इन दो दिनों में शीतल की तबियत में पूरी तरह से सुधार आ चुका था क्यों कि जब उसे हॉस्पिटल लाया गया था तब तक जहर उसके शरीर में पूरी तरह से नही फैला था।
तीसरे दिन उसे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गयी लेकिन शीतल तो हॉस्पिटल में थी ही नही। वो तो पहले ही कहीं जा चुकी थी। राज ने उसे ढूढ़ना भी ज़रूरी नही समझा और चुप-चाप घर आ गया।
गौरी बार-बार राज से पूछती-“पापा,मम्मी कब आएगी?”पर राज उसे कोई जवाब नही देता।
शायद शीतल ने जहर खाने से पहले कोई खत लिखा हो। ये सोच कर राज पूरे घर में खत ढूढ़ने लगा उसे कोई खत तो नही मिला पर एक डायरी मिली उसमें कुछ खत भी रखे हुए थे। राज ने रात को गौरी के सोने के बाद उस डायरी को पढ़ना शुरू किया।
लिखा था-
“मैं 16 साल की थी। उसी समय मेरी दीदी की शादी हुई थी। दीदी की शादी बड़े घर में हुई थी। उनके पास पैसों की कोई कमी नही थी पर दीदी कहती थी कि वो दहेज की माँग करते हैं,उसे दहेज के लिए मारते हैं जबकि मुझे या घर में किसी और को ऐसा कुछ भी नही लगता था। जीजा जी के व्यवहार से ऐसा कभी नही लगा की उन्हें दहेज चाहिए या फिर वो दीदी को दहेज के लिए मारते होंगे। एक दिन पता चला की दीदी ने खुद को आग लगा ली। आग उन्होने खुद लगाई थी या फिर किसी और ने हमें नही मालूम था। हम किसी के खिलाफ कुछ नही कर सके। बाद मे पता चला की उन्हें जला कर मारा गया था। मुझे ये नही मालूम की उनके साथ ऐसा क्यों किया गया था पर इस हादसे ने मेरे अंदर शादी को लेकर एक डर पैदा कर दिया था मुझे लगता था की अगर मेरी शादी भी ऐसी ही किसी जगह हुई तो मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ होगा। दीदी की मौत के बाद मैंने खुद पर ध्यान देना बहुत कम कर दिया था। मैं बहुत अस्त-व्यस्त हो गयी थी। दीदी के साथ हुए हादसे को 1 महीने बीत गये। इस बीच मैं खुद में बहुत सीमित हो गयी थी। मैंने अपने दोस्तों से बोलना भी छोड़ दिया था,किसी को कोई खास फ़र्क नही पड़ा पर सतीश जो मेरे साथ पढ़ता था उसे मुझसे बोले बिना नही रहा जाता था वो मुझसे प्यार करता था लेकिन मुझे ये प्यार जैसी चीज़ बेकार लगती थी। कई बार जब वो ज़्यादा पीछे पड़ा रहता था तो मैं उससे बोल देती थी। मुझे उससे थोड़ा भी लगाव नही था पर वो इतना अच्छा था कि मैं उसे कुछ कहती भी नही थी। स्कूल से मेरा घर करीब 2 किलोमिटर था,इस बीच कुछ रास्ता सूनसान भी था,उस हादसे के बाद मैंने हर किसी से बोलना छोड़ दिया था इसलिए मैं अकेले ही आया-जाया करती थी। एक दिन मैं स्कूल से आ रही थी,मैंने ध्यान दिया की कुछ लड़के मेरा पीछा कर रहे थे। मैंने इस बात को किसी से नही कहा और अकेले ही स्कूल आती-जाती रही,पर शायद वो लड़के मेरा हर रोज पीछा करते थे। वो मेरी उम्र के ही थे। मुझे उनसे डर भी लगता था पर फिर भी मैंने अपना रास्ता नही बदला। एक दिन स्कूल से वापस लौटते समय उन लड़कों ने मेरा अपहरण कर लिय। वो लोग मुझे अपने साथ किसी खाली मकान में ले गये। वहाँ कोई और नही था। उन तीनों ने मेरे साथ…………. । अगली सुबह वो मुझे वापस उसी जगह छोड़ गयें। मैंने खुद को संभाला और अपने घर आ गयी। घर पर सब मुझे ही ढूढ़ रहे थे। मैंने सारी बात अपनी माँ को बता दी। उन्होंने मुझे चुप रहने के लिए कहा। मुझे लगा था कि वो उनके खिलाफ कुछ करेंगी ,पर उन्होंने मुझे किसी से कुछ भी कहने के लिए मना कर किया। मैं पूरी तरह से टूट गयी थी। मेरा दिल कहीं भी नही लगता था,मन करता था की जहर खा कर मर जाऊं। मैं कभी सतीश से जुड़ना नही चाहती थी पर हालात ही ऐसे थे कि मुझे उससे जुड़ना पड़ा क्यों कि वो मेरे जीने की वजह बना,उसने मुझे फिर आगे बढ़ने की हिम्मत दी। हर कदम पर मेरी मदद की। धीरे-धीरे मेरी सतीश से अच्छी दोस्ती हो गयी। मैं हर बात उसे बताने लगी,शायद मैं उससे प्यार भी करने लगी। मैंने सोच लिया था कि मैं शादी करूँगी तो सिर्फ़ सतीश से। जो मुझे अभी बिना किसी रिश्ते के इतना समझता है वो किसी रिश्ते में बाँधने के बाद कितना समझेगा। मैंने सतीश को कभी भी यह अहसास नही होने दिया की मैं उससे प्यार करती हूँ। अपने प्यार को अपने दिल में ही दबाए रखा। 2 साल तक हम दोनों ने एक दूसरे से कुछ नही कहा लेकिन 2 साल बाद जब 12वीं में थी सतीश ने मुझसे अपने प्यार का इज़हार किया। मुझे जिंदगी में इतनी खुशी कभी नही हुई जितनी उस पल हुई लेकिन मैंने जो किया वो खुद मेरी समझ से बाहर था। मैंने उसे मना कर दिया। उसने मुझे मनाने की बहुत कोशिश की पर मैं नही मानी जबकि मैं खुद उससे प्यार करती थी। उस दिन के बाद से हम दोनों ने एक-दूसरे बोलना छोड़ दिया। इसलिए नही की हम दोनों एक-दूसरे नफ़रत करने लगे थे बल्कि इसलिए की ना तो उसे मुझसे अपना दर्द छुपाने की हिम्मत थी ना ही मुझ में उसे मना करने कि कोई वजह दे पाने की ।
12वीं के बाद मैं और सतीश अलग हो गये फिर हम कभी नही मिले। एक-दो बार मैंने उससे मिलने की कोशिश की पर वो आगे की पढ़ाई के लिए शहर के बाहर चला गया था। मैं उसे कभी नही मिल पाई। वो मुझे भूल चुका था या नही,मुझे नही मालूम पर मैं उसे नही भूल पाई थी। मुझे हर पल उसकी ज़रूरत होती। मैं सोचती की काश वो वक्त फिर से वापस आ जाए जिस समय उसने मुझसे प्यार का इज़हार किया था और मैं उससे हाँ कह देती या फिर एक बार फिर वो मुझे मिल जाए और मैं उससे कह सकूँ कि मैं उससे प्यार करती हूँ।
मेरे घर में कभी किसी को ये अहसास नही हुआ कि मैं किसी को प्यार करती हूँ। मेरी शादी के प्रति लगाव ना होने की वजह भी सतीश ही था। मैंने कभी सतीश की वजह से अपनी पढ़ाई को खराब नही होने दिया,इस उम्मीद से कि अगर मैं कुछ बन गयी तो हो सकता है कि एक बार फिर से सतीश तक पहुच सकूँ।”
उसके बाद उसने जो भी कुछ लिखा था सब उस दिन लिखा था जिस दिन उसने जहर खाया था। लिखा था-
“सतीश ने मुझ से कहा की तुम अच्छे नही हो। तुम और जय पहले से ही दोस्त थे और मेरे साथ खेल खेल रहे थे। तुम्हारे पास पैसों की भी कमी नही थी पर तुमने सब कुछ मुझे फँसाने के लिए किया। मैं जानती तुमने कुछ भी ग़लत नही किया है और ना ही तुम कुछ कर सकते हो पर फिर भी मैं अब तुम्हारे साथ नही रह सकती। मुझे ये तो नही मालूम कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ या नही…………। मुझे आज सिर्फ़ एक रास्ता दिख रहा है वो मौत का है, मेरे मरने की वजह सतीश नही कुछ और है, हो सके तो पता लगा लेना…………।”
इसके आगे कुछ भी नही लिखा था। राज ने डायरी पढ़ कर मेज पर रख दी और खुद सो गया।
सुबह राज की आँख देर से खुली वो भी तब जब किसी ने डोरबेल बजाई,बाहर रिया थी। राज के दरवाजा खोलते ही वो अंदर आ गयी। उसने राज से कुछ नही बोला ना ही राज ने रिया से। रिया गौरी के साथ खेलने लगी। करीब 2 घंटे बाद राज रिया के पास आया।
“तुम मम्मी-पापा से पूछ कर आई हो?”राज ने पूछा।
“हाँ,मम्मी ने ही भेजा है,”रिया ने कहा।
“किसलिए?”
“गौरी की वजह से।”
“ठीक है,मैं दिल्ली जा रहा तुम गौरी का ख्याल रखना,” राज ने कहा।
“क्यों?आप को दिल्ली में क्या काम है?” रिया ने पूछा।
“बिजनेस के लिए।”
“भैया,आपको भाभी की कोई फ़िक्र नही है।”
“नही,अगर उसे मेरे साथ नही रहना तो ना रहे मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता।”
“पर भाभी आप को छोड़ कर गयी ही क्यों?आप दोनों तो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हो,फिर क्यों?’रिया ने पूछा।
“इस डायरी को पढ़ लेना सब समझ आ जाएगा,” राज ने रिया को शीतल की डायरी पकड़ाते हुए कहा।
“पर आप कहीं मत जाओ,”रिया ने कहा।
राज कुछ नही बोला और दूसरे रूम में चला गया।
डायरी पढ़ने के बाद रिया राज के पास आई।
“भैया,क्या भाभी आप से प्यार नही करती थी?” रिया ने पूछा।
“सिर्फ़ मुझ से ही प्यार करती है,” राज ने कहा।
“तो फिर आप को क्यों छोड़ कर गयी?” रिया ने पूछा।
“बस,थोड़ी पागल है,” राज ने कहा।
“मम्मी कह रही थी कि शीतल भाभी चाहे जैसी भी हो वो आप से बेहद प्यार करती हैं और अगर वो आप को छोड़ कर गयी है तो ज़रूर आप की ही कोई ग़लती है,” रिया ने कहा।
“वो तो शीतल को पसंद नही करते थे फिर क्यों उन्हें दुख हो रहा है?” राज ने कहा।
“पसन्द नही करते थी पर आज उन्हे पसन्द है,वो अब आप दोनों पर भरोसा करते हैं,” रिया ने कहा।
“अब जब वो है ही नही तो भरोसा करने का क्या मतलब,” राज ने कहा।
“अगर नही है तो आप की वजह से आपने उन्हें कभी समझा ही नही,अगर समझा होता तो जो बाते उन्होंने डायरी में लिखी हैं,वो आप को बहुत पहले बता दी होती,” रिया ने कहा।
“मुझे सब पहले से ही पता था,मैं ये डायरी कई बार पढ़ चुका हूँ। इसमें ऐसा कुछ नही लिखा है जिससे पता चले की उसने जहर क्यों खाया और हमें छोड़ कर क्यों गयी?”
“अब क्या वो कभी नही आएँगी?”रिया ने पूछा।
राज कुछ कहे बिना कहीं बाहर चला गया। दिन भर वो सड़क पर पागलों की तरह घूमता रहा। ना तो उसकी आँखों से आँसू गिरते ना ही वो किसी से बात करता बस खुद में ही खोया हुआ रहता। शीतल उसके लिए क्या थी उसे आज समझ आ रहा था। 2-3 दिन बीत गये पर शीतल वापस नही आयी। राज का मन घर में नही लगता था लेकिन गौरी की वजह से उसे मजबूरन घर आना पड़ता था। जब वो राज से अपनी तोतली आवाज़ में पूछती-“पापा,मम्मा कब आएगी।” तो राज के पास कोई भी जवाब नही होता था। वो कहता भी क्या?उस समय राज उसे कोई झूठी कहानी सुना कर मना लेता था पर वो खुद को नही समझा पाता था खुद अकेले में छत पर जाकर दो आँसू बहा लेता। राज को जैसे यकीन हो गया था की इस बार शीतल वापस नही आएगी।
अगले दिन अख़बार में खबर थी की किसी ने बिजनेसमैन जय की हत्या कर दी। हत्या की वजह चोरी या लूट बताई जा रही थी। राज ने खबर पढ़ी और पेपर को एक किनारे रख दिया। तभी रिया वहाँ आई।
“भैया,मैं घर वापस जा रही हूँ,” रिया ने कहा।
“क्यों?”
“मेरा स्कूल है,” रिया ने कहा।
“ठीक है,…। पर कुछ देर रूको मैं भी चलता हूँ,” राज ने कहा।
राज 8 महीने बाद अपने घर वापस जा रहा था। घर पहुँचते ही रिया,गौरी को गोद में लेकर अंदर चली गयी,पर राज दरवाजे पे ही खड़ा रहा। कुछ देर बाद जब अंदर से किसी ने आवाज़ दी तब जाकर राज अंदर गया। अपनी माँ के पैर छुए और फिर अपने कमरे में चला गया।
उसका कमरा वैसा ही था जैसा वो छोड़ कर गया था। कुछ देर बाद उसकी माँ भी उसके कमरे में आई।
“अब यहीं रहोगे?” राज की माँ ने पूछा।
“नही।”
“क्यों?और तुमने अपनी हालत क्या बना रखी है?” राज की माँ ने कहा।
“मम्मी,आप चाहती थीं ना कि मैं शीतल को छोड़ दूँ,लीजिए वही मुझे छोड़ गयी,” राज ने कहा और अपनी माँ की गोद में सिर रखकर लेट गया। उसकी आँखें नम हो गयी थी।
“कहाँ गयी है वो?” राज की माँ ने पूछा।
“पता नही।”
“कहीं जय के पास तो नही गयी,” राज की माँ ने कहा।
‘नही,जय की किसी ने हत्या कर दी है,” राज ने कहा।
“तो फिर…,” राज की माँ ने कहा।
राज ने डायरी में लिखी हर बात अपनी माँ को बता दी और बोला-“वो सतीश के साथ भी नही है। ”
“वो उन 10 दिन कहाँ थी?” राज की माँ ने पूछा।
“मुझे नही पता पर उसने कुछ भी ग़लत नही किया है ना ही वो कुछ ग़लत कर सकती है।”
“फिर भी तुम्हें पूछना चाहिए था कि वो कहाँ गयी थी। हो सकता है उस समय उसके साथ कुछ ऐसा हुआ हो जिसकी वजह से आज उसने घर छोड़ा,”राज की माँ ने कहा।
“ऐसा कुछ होता तो वो मुझे ज़रूर बताती,” राज ने कहा।
“कुछ बातें बताने के लिए हिम्मत चाहिए होती है,जो उसके पास नही थी ना ही तुमने उसे कभी कुछ कहने की हिम्मत दी,” राज की माँ ने कहा।
“अब क्या करूँ?मैं उसके बिना नही जी सकता,” राज ने कहा।
“उसे ढूढों हिम्मत हार कर घर बैठने से थोड़ी ही मिलेगी।”
“गौरी का क्या होगा?वो कैसे रहेगी?”राज ने कहा।
“उसके लिए हम हैं। क्या अब हम पर इतना भी विश्वास नही रहा?”
“है,पर वो मेरे बिना नही रह सकती।”
“तुम छोड़ दो बाकी हम उसे संभाल लेंगे।”
अगले दिन राज गौरी को वहीं छोड़ कर कर वापस अपने उसी घर में आ गया जिसमें शीतल की यादें बसी थीं। उसने पुलिस में भी रिपोर्ट कर दी थी पर कोई खबर नही मिली। राज सतीश से भी मिला पर वो उसके पास नही गयी थी। कुछ दिन बाद राज को किसी काम से दिल्ली जाना पड़ा। वहाँ वो किसी होटल में रुकने की बजाय अपने किसी दोस्त राघव के घर रुका।
राघव का घर बड़ा था। घर में घुसते ही बड़ा सा हॉल जहाँ बैठने के लिए सोफा था। राज को वहाँ 3 दिन के लिए रुकना था। ज़्यादातर राज हॉल में बैठना पसंद करता। राज वहीं सोफे पर बैठा था और हॉल में कोई नौकरानी पोछा लगा रही थी। राज ने उसकी ओर कोई ध्यान नही दिया, वो राघव से बात करने में व्यस्त था। राज का ध्यान उसकी ओर तब गया जब उसे किसी ने बुलाया और वो बोली-“आई”
आवाज़ सुनते ही राज काँप गया उसका ध्यान तुरंत उस नौकरानी की ओर गया। जैसे ही उसकी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी वो उसे देखता ही रह गया। वो उसकी शीतल थी। अभी तक शीतल ने भी राज की ओर ध्यान नही दिया था पर अब दोनों की नज़रें मिल गयी थीं। शीतल ने अपनी नज़रें झुका ली और अंदर कमरे में चली गयी।
शीतल ने जो कपड़े पहने हुए थे वो बहुत ज़्यादा गंदे थे,उसके बाल बिखरे हुए थे,आँखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये थे,उसे देखकर ही उसकी खराब हालत का पता लग रहा था। राज ने उससे कुछ भी नही कहा। शीतल भी जितनी जल्दी हो सका वहाँ से चली गयी। कुछ देर बाद राज भी उसके पीछे उस जगह पहुँच गया। शीतल किसी बस्ती में रहती थी। वहाँ सारे घर लगभग एक जैसे थे पर कोई अच्छी हालत में नही था।
राज जो की अपने शहर का बहुत अमीर आदमी था उसकी पत्नी इतनी ग़रीबी से जिंदगी जी रही थी,उसे अपना गुज़रा करने के लिए लोगों के घर काम करना पड़ रहा था।
राज ने दरवाजा खटखटाया,किसी औरत ने खोला शीतल नही थी।
“कौन?”
“मुझे शीतल से मिलना है,” राज ने कहा।
“शीतल,तुमसे कोई मिलने आया है” की आवाज़ के साथ वो औरत अंदर चली गयी।
शीतल ने राज को देखा और उसे अंदर आने को कहा।
“पानी?” शीतल ने पूछा।
“नही।”
“यहाँ क्यों आए हो?”
“तुम्हें अपने साथ ले जाने और किस लिए?” राज ने कहा।
“पर मैं अब तुम्हारे साथ नही चल सकती हूँ।”
“क्यों नही चल सकती हो?”राज ने कहा।
“मैंने वापस लौटने के लिए घर नही छोड़ा है।”
“छोड़ा ही क्यों?किसका खून ? तुम क्या कह रही हो?मुझे कुछ नही सुनना है……। बस तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हे इस तरह से जिंदगी जीने नही दे सकता हूँ,”राज ने कहा।
“क्यों कुछ नही सुनना राज,क्या तुम्हें इससे कोई फ़र्क नही पड़ता की मेरे साथ क्या हुआ?”शीतल ने कहा।
राज कुछ देर चुप रहने के बाद बोला-“सब कुछ सुनना है,तुम्हारे हर दर्द को बाँटना है,लेकिन यहाँ नही शीतल,घर चलो वहाँ।”
“मैं नही चल सकती,राज,तुम मुझसे ज़िद मत करो,” शीतल ने कहा।
राज कुछ नही बोला।
“तुम जानना चाहोगे की उन 10 दिन मैं कहा रही,मैंने किसका खून किया है।”
“हाँ।”
“जय का खून……।”
“जय का क्यों?”
“तुमने मुझसे जॉब छोड़ने के लिए कहा था,मैंने उसी दिन जॉब छोड़ दी थी उसके बाद जय से मिलने गयी थी। उससे कहने के लिए कि अब मैं उससे कभी नही मिल सकती हूँ। जय अच्छा इंसान नही था मुझे कई बार ऐसा लगा कि वो सिर्फ़ अच्छा बनने की कोशिश करता है पर मैं ध्यान नही देती थी। उस दिन जब मैंने उससे कहा की अब मैं उससे नही मिल सकती तो उसने मेरे साथ……………। 10 दिन तक वो मेरे साथ खेलता रहा और मैं कुछ नही कर सकी। जी तो चाहता था खुद को मिटा लूँ पर जिंदगी ने मेरे साथ पहली बार तो खेल खेला नही था,मुझे तो आदत सी हो गयी थी जिंदगी के सितम सहने की। जब भागने का मौका मिला तो वापस घर लौट आई लेकिन किसी ने मुझसे मेरा हाल नही पूछा,मुझे भला-बुरा कहा। क्या सिर्फ़ इसलिए की मैं एक लड़की हूँ?मेरे साथ क्या हुआ इससे किसी को कोई फ़र्क नही पड़ा। मैंने सोचा था की तुम मुझसे इतना प्यार करते हो की मेरा दर्द समझ जाओगे,मेरी ताक़त बनोगे, जय को सज़ा दिलाओगे पर ऐसा कुछ नही हुआ। तुमने मुझसे एक बार भी नही पूछा कि मैं कहाँ थी? किस हालत में थी?इस हादसे को भूल कर मैंने फिर से एक नयी जिंदगी की शुरुआत तो कर ली थी लेकिन उसी तरह जी नही सकी। यही वजह थी की कभी तुमसे रूठ जाती तो कभी…………,” शीतल ने कहा।
“तुम्हें मुझसे एक बार कहना तो चाहिए था और जब तुम वापस आ ही गयी थी तो फिर घर क्यों छोड़ा?”राज ने पूछा।
“क्यों क़ि मुझमें जय का अंश पल रहा है,इसलिए मैंने जय को भी मारा और घर भी छोड़ा,” शीतल ने कहा।
“तुमने कुछ भी किया हो, मुझे इससे कोई फ़र्क नही पड़ता। तुम मेरे साथ घर चलो,”राज ने कहा।
“बच्चों की तरह ज़िद ना करो। मैं जैसे भी जी रही हूँ जीने दो मुझे,” शीतल ने कहा।
“मैं नही जी सकता तुम्हारे बिना।”
“गौरी के सहारे जियो……………………। राज वापस चले जाओ,मेरी वजह से कितना सहोगे?अगर मैं तुम्हारे साथ चली भी तो ये समाज हमें नही जीने देगा।”
“हमने समाज की परवाह कब की,शीतल?”
“जो भी हो मुझे यहीं रहना है,इसी घर में,इसी तरह से,” शीतल ने कहा।
“कभी मेरे करीब आना चाहती थी और आज मुझसे ही दूर……………,” राज ने कहा।
“आज दूर होना ही अच्छा है,” शीतल ने कहा।
“शीतल,गौरी के लिए ही चलो।”
“नही चल सकती,………। तुम जाओ यहाँ से।”
राज चला गया,उसके जाने के बाद शीतल तकिये में मुँह दबा कर रोने लगी।
राज अपने दोस्त के घर कुछ दिन इसी आश में रुका रहा क़ि शायद शीतल मान जाए,लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ। शीतल हर रोज़ वहाँ काम करने आती,उसे कोई फ़र्क नही पड़ता था की राज उसे इस हालत में देख रहा है। ना तो राज ने उससे कभी कोई बात की ना ही उसने कभी कुछ कहा। जब राज को कोई उम्मीद नही दिखी तो वापस अपने शहर आ गया।
गौरी को लेकर अपने घर जाने लगा तो उसकी माँ बोली-“तुम अब यहीं रहो। ”
“शीतल के साथ इस घर में रह सकता हूँ उसके बिना नही,” राज ने कहा।
गौरी को लेकर वो अपने बनाए हुए घर में आ गया। राज सुबह गौरी को स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस चला जाता। दोपहर में रिया गौरी को संभालने के लिए आ जाती थी। राज भी 6 बजे तक घर आ जाता था,उसके आने के बाद रिया चली जाती थी।
कुछ महीने बीत गये,इन कुछ महीनो में राज ने अपना बिजनेस बहुत ज़्यादा बड़ा लिया। साथ ही उसने ग़रीब बच्चों के लिए स्कूल भी खोले,ऐसी औरतों के रहने की व्यवस्था की जिन्हे समाज ने ठुकरा दिया या फिर जो मजबूर और बेसहारा हो। उसका सोचना था की शायद इन सब कामों की वजह से शीतल मान जाए। राज ने कई बार उससे बात करने ,मिलने की कोशिश की लेकिन कुछ भी नही हो सका क्यों कि राज के वापस लौटने के बाद शीतल वहाँ से कहीं और चली गयी। कहाँ? किसी को नही पता।
राज बहुत तेज़ी से उँचाई पर जा रहा था। उसके पास पैसों की कोई कमी नही रह गयी थी अब वो शहर के अमीर लोगों में एक था। शहर में उसका नाम भी हो गया था। बाहर की दुनिया को राज ने आबाद कर लिया था लेकिन दिल की दुनिया आज भी बर्बाद थी। जिंदगी में पैसा तो था लेकिन खर्च करने वाली नही।
क्या प्यार किसी को इतना कमजोर कर देता है की सब कुछ होते हुए भी हम कभी खुश नही रह पाते। खुशियाँ हमारे चारो ओर खेल रही होती हैं फिर भी मन उदास होता है किसी की यादों में खोया रहता है। कभी राज के लिए शीतल की आँखों में आँसू थे और आज राज शीतल के लिए रो रहा था। दोनों ने कभी नही सोचा था की उन्हें एक दूसरे से इतना प्यार हो जाएगा।शीतल को घर छोड़े हुए 7 महीने हो गये थे। राज के लिए तो जैसे आज ही वो घर छोड़ कर गयी थी। राज को खुद से ज़्यादा गौरी की फ़िक्र थी अभी कुछ दिन पहले अचानक गौरी की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब हो गयी थी। डॉक्टर ने बताया कि उसके दिल में छेद है। ज़रूरत पड़ने पर ओपरेशन भी करना पड़ सकता है। उसे देखभाल की बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी। ऐसे में राज के लिए शीतल का ना होना और भी दुख दे रहा था। उसके दिल में आता –“क्या शीतल, गौरी के लिए भी घर वापस नही आएगी पर शीतल को गौरी के बारे में पता कैसे चलेगा?”राज ज़्यादातर समय घर पर ही रहता ताकि गौरी का ध्यान अच्छे रख सके अच्छे से अच्छे डॉक्टर तो थे पर उस मासूम की माँ उसके साथ नही थी। कई बार गौरी राज से पूछती थी-“पापा,मेरी मम्मी कहाँ है?सबकी मम्मी होती हैं पर मेरी क्यों नही है?”
राज के पास उसके इस मासूमियत भरे सवाल का कोई जवाब नही होता। इतने दिनों में गौरी शीतल को भूल गयी थी पर दूसरों की मम्मी को देखकर वो ज़िद करने लगती थी।
रात के 8 बज रहे थे, राज गौरी को सुलाने के बाद टी.वी. देख रहा था। तभी फोन की बेल बजी।
“हैलो,”राज ने फोन रिसीव करते हुए बोला।
“हैलो,”दूसरी ओर से शीतल की आवाज़ आई।
“शीतल………तुम,” राज ने चौंकाते हुए कहा।
“मुझे कुछ पैसों की ज़रूरत है।”
“तुम हो कहाँ?”
“आगरा में।”
“वापस आ जाओ।”
‘मैं ज़्यादा बात नही कर सकती। पैसे कब तक दे दोगे।”
“कल………। हम मिलेंगे कहाँ?”
“रेलवे स्टेशन के पास।”
“मैं अपनी कार से रहूँगा।”
“तो क्या हुआ?”शीतल ने कहा और फोन रख दिया।
राज ने फिर फोन किया पर किसी ने रिसीव नही किया।
अगले दिन राज गौरी को अपने घर छोड़ कर आगरा चला गया। रेलवे स्टेशन के पास बताई जगह पर शीतल पहले से ही खड़ी थी। हरे-लाल रंग का सूट पहना हुआ था उसने। बहुत साधारण सी लग रही थी,पहले जैसी सुंदरता नही दिख रही थी। हल्की-हल्की ठंडक थी फिर भी शीतल ने कोई गर्म कपड़े नही पहने।
“कैसे हो?” शीतल ने राज के कार से बाहर निकलते ही पूछा।
“अच्छा हूँ और तुम?”
“मैं भी………………। मेरी नन्ह-सी जान कैसी है?”
“वो भी अच्छी है………। तुम्हे बहुत याद करती है,” राज ने कहा।
कुछ देर दोनों शांत रहे शायद वो आपस में बात करने के लिए शब्द ढूँढ रहे थे।
“अपने घर नही ले चलोगी।”
“क्यों नही?” शीतल ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।
दोनों कार से चल दिए। राज कार चला रहा था और शीतल उसके बगल में बैठी थी। राज ने अपना एक हाथ शीतल के हाथ पर रख दिया,शीतल ने देखा और फिर नज़रें हटा लीं।
“तुम कुछ बोल क्यों नही रही हो?” राज ने पूछा।
शीतल ने राज की ओर देखा फिर गहरी सांस भारती हुई बोली-“घर पहुँच कर बात करते हैं।”
“तुम्हारे बच्चे का क्या हुआ?” राज ने पूछा।
“गिर गया।”
“गिर…………। कैसे?”
“सीढ़ियों से फिसल गयी थी,पैर में भी चोट तभी लगी थी,” शीतल ने कहा।
राज का ध्यान उसके पैर की ओर गया,पट्टी बँधी थी और हल्की सूजन भी थी। तब तक घर आ गया।
“तुम बैठो यहाँ बैठो,मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ,” शीतल ने ज़मीन पर एक चादर बिछाते हुए कहा।
“तुम ऐसी जगह रहती हो,” राज ने घर की हालत देखते हुए कहा।
“क्यों क्या हुआ है?”
“कुछ नही,” राज ने कहा और एक किनारे दीवारा का सहारा लेकर बैठ गया।
“तुम्हारा बिजनेस कैसा चल रहा है?” शीतल ने चाय पकड़ाते हुए पूछा।
“बहुत अच्छा…………………अब मैं पार्ट्नरशिप में नही हूँ,” राज ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
“मैंने तुम्हे पैसों के लिए फोन किया था,मुझे 2000 रुपयों की ज़रूरत है।”
“क्यों?ऐसी क्या ज़रूरत पड़ गयी जो मुझ से……………।”
“जहाँ काम करती हूँ,वहाँ मुझसे कुछ समान टूट गया है बस उसी लिए………………। मैं तुमसे कहती ना पर मेरी तबीयत नही ठीक है और मैं ज़्यादा काम नही कर सकती हूँ इसलिए कहा। वो मुझे कोई ग़लती होने पर बहुत बुरा-भला कहती हैं कई बार तो तुम्हारे बारे में भी कहने लगती जो मुझे अच्छा नही लगता है।”
“वहाँ काम क्यों नही छोड़ देती?”
“काम कम रहता है और पैसा भी ठीक मिल जाता है………फिर इतनी जल्दी कहीं और काम भी तो नही मिल जाएगा।”
“तुम्हे ये सब करने की ज़रूरत ही क्या है?पढ़ी-लिखी हो किसी भी जगह रिसेप्सनिस्ट…की जॉब मिल जाएगी तुम्हें,तुम कर भी चुकी हो फिर क्यों इस तरह से अपनी जिंदगी जी रही हो?”राज ने कहा।
“शायद मेरी जिंदगी में यही सब लिखा है।”
“पागलों जैसी बात क्यों कर रही हो……………। तुम्हें खुद पता है की तुम अकेले भी अपनी जिंदगी को बेहतर ढंग से जी सकती हो।”
शीतल कुछ नही कह सकी,वो अपनी नज़रें राज से चुराने की कोशिश करने लगी।
“इधर आकर बैठो,” राज ने अपने बगल में बैठने का इशारा करते हुए कहा।
शीतल राज के बगल में पर उससे कुछ दूर हटकर,दीवार के सहारे बैठ गयी। राज हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
“क्या हुआ?तुम हँसे क्यों?”
“कुछ नही।”
“फिर क्यों हँसे?”
“तुम्हारी हरकत पर।”
“क्या किया मैंने?”
“कुछ नही…………। कभी मुझसे सटकर बैठने की कोशिश करती रहती थी और आज मुझसे दूर बैठने की।”
शीतल राज से सटकर बैठ गयी। दोनों ने एक-दूसरे को एक पल के लिए देखा और फिर मुस्कुरा दिए। शीतल ने अपना सिर राज एक कंधे पर रख दिया। राज उसके बालों में अपना हाथ फेरने लगा। अपनी उंगलियों में उसके बालों की लटों को लपेटने की कोशिश करता।
“अब भी तुम्हारा दिल पहले की तरह बाहर घूमने का करता है।”
“नही।”
“क्यों?पहले मुझसे बाहर चलने के लिए कितना ज़िद करती थी। अब क्या हुआ?”
“अब ज़िद करने के लिए तुम नही हो…………………………। तुम मुझसे अब भी प्यार करते हो या कोई और पसंद आ गयी है?”
“मुझे कोई पसंद नही आया पर तुम्हारा दिल ज़रूर किसी ना किसी पर आ गया होगा ,हर बार की तरह,” राज ने कहा।
शीतल हँस दी-“क्या मैं इतनी बुरी हूँ?”
“मैंने बुरा नही कहा…………। मेरा मतलब था की तुम्हारा कोई दोस्त बन गया होगा।”
“इशारा कुछ ऐसा ही था………। अब कोई दोस्त नही है मेरा ना कोई लड़की ना ही लड़का।” शीतल ने अपने हाथों की उंगलियों को राज की उंगलियों में जकड़ते हुए कहा। -“इन हाथों में सिर्फ़ तुम्हारा हाथ ही अच्छा लगता है। ”
“अफ़सोस की ये हाथ कभी मिलते ही नही,” राज ने कहा।
दोनों खामोश हो गये,नज़रें एक-दूसरे से चुराने की कोशिश कर रहे थे। पर हाथों की पकड़ मजबूत हो गयी थी।
राज ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा-“लौट क्यों नही चलती मेरे साथ। ”
“किसी का खून किया है……। ,नही चल सकती हूँ आख़िर सज़ा भी तो मिलनी है पुलिस से ना सही किस्मत से ही।”
“जय जैसे का खून करने में कोई गुनाह नही है।”
“फिर भी मैं नही चल सकती हूँ………। मुझसे वपास लौटने के लिए मत कहो।”
“ठीक है,नही कहूँगा……………………। एक गिलास पानी मिलेगा।”
“नही मिलेगा,” शीतल ने हँसते हुए कहा और पानी लेने के लिए उठ गयी।
“7 बज गये हैं,खाना नही बनाओगी,” राज ने कहा।
शीतल ने पानी देते हुए बोला-“तुम थोड़ी देर आराम करो तब तक मैं बना देती हूँ। ”
“आराम क्यों?मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा,जैसे पहले देता था।”
“शीतल,जब जय ने तुम्हारे साथ ऐसा कुछ किया था तो फिर वो बाद में शादी क्यों करना चाह रहा था?” राज ने पूछा।
“शायद उसे डर था की कहीं मैं उसके खिलाफ कुछ करूँ ना,” शीतल ने कहा।
दोनों ने मिलकर खाना बनाया और फिर एक साथ खाया। इस बीच दोनों की आपस में कई बार बहस हुई कभी सब्जी को काटने को लेकर तो कभी बनाने को लेकर।
शीतल ने सोने के लिए ज़मीन पर एक चादर बिछाई। उसके पास दो चादर थीं एक वो ओढती थी,एक बिछाती।
उसने राज के लिए एक चादर बिछा दी थी और दूसरी उसे ओढ़ने के लिए दे दी। वो खुद अपने दुपट्टे को ज़मीन पर बिछा कर लेट गयी। वो किन हालत में जी रही थी इसका अंदाज़ा लगाना राज के लिए कठिन नही था।
राज ने शीतल को अपने पास लेटने के लिए कहा। पहले तो शीतल कुछ हिचकिचाई फिर उसी चादर पर वो भी लेट गयी,राज के हाथ को तकिया बना कर।
“तुम इतनी ग़रीबी में यहाँ जी कैसे रही हो?” राज ने पूछा।
“हम दोनों ऐसी जिंदगी पहले भी जी चुके हैं।”
“तब मजबूरी थी,आज कौन सी मजबूरी है?”
“कोई नही।”
“फिर क्यों?”
“बस ऐसे ही।”
“पागल हो,जो दिल में आया वो करने लगती हो।”
“हाँ,” शीतल ने हल्का मुस्कुराते हुए कहा।
“तुमने दिल्ली क्यों छोड़ा?”
“तुमसे दूर होने के लिए।”
“फिर मुझे पास क्यों बुलाया?”
“मजबूरी थी,कुछ पैसों की,कुछ दिल की।”
“अब भी मुझसे प्यार है।”
शीतल ने कुछ नही बोला। लेकिन कहना तो चाहती थी-“मैं तुमसे बेपनाह प्यार करती हूँ। जितना डूब कर तुमने मुझसे प्यार किया है उतना ही मैंने भी तुमसे। पूरी तरह से टूट कर चाहा है तुम्हें,मेरे शरीर के हर रोएँ में बस तुम ही बसते हो। “पर अफ़सोस की उसके ये शब्द उसके दिल तक ही सीमित रह गये ज़ुबान से वो कुछ भी नही कह सकी।
“बोलो,क्या अब भी तुम मुझसे प्यार करती हो?”
“हाँ,…………………क्यों कि तुम बहुत अच्छे हो। कितना भी दुख हो पर तुम्हारे करीब होती हूँ तो सब भूल जाती हूँ,मैं खुद को तुम्हारे साथ सुरक्षित महसूस करती हूँ। बहुत दोस्त बने कोई अच्छा तो कोई बुरा पर तुम जैसा मुझे कोई ना मिला। खुद से ज़्यादा भरोसा है तुम पर,दुनिया में अगर किसी को दिल से पाना चाहा है तो सिर्फ़ तुम्हे। मेरे लिए एक पल भी तुम्हारे बिना रहना बहुत मुश्किल है,राज। मैं जय के साथ घूमती ज़रूर थी पर हर पल तुम्हारे बारे में सोचती थी कि काश तुम मेरे साथ होते,मुझे तुम्हारी खुशी चाहिए और कुछ भी नही। मैंने तुम्हे भी इसीलिए छोड़ा ताकि तुम अपने घर वापस लौट जाओ। जिंदगी के गम भुलाने के लिए गौरी की जिंदगी तुम्हारे साथ जोड़ दी……,” शीतल की आँख से आँसू बहने लगे,राज की आँखें भी भर आई थी।
“मैं घर वापस नही गया,मुझे आज भी तुम्हारे वापस लौटने का इंतजार है,” राज ने कहते हुए शीतल के माथे को चूम लिया। शीतल कुछ नही बोली। दोनों बाते करते-करते सो गये। उन्हे सोए हुए कुछ घंटे के बाद शीतल बार-बार करवटें बदलती कई बार उठ कर बैठ जाती फिर सो जाती उसके पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था। दर्द बढ़ता ही जा रहा था।
“राज,बहुत दर्द हो रहा है,” शीतल ने राज को उठाते हुए कहा।
“क्या हुआ शीतल?क्या दर्द हो रहा?”
“पेट में,बहुत तेज दर्द हो रहा,राज कुछ करो मैं बर्दाश्त नही कर सकती हूँ।”
“शीतल कुछ नही होगा,हम हॉस्पिटल चलते हैं।”
“हॉस्पिटल दूर है और मुझे कहीं नही जाना।वहाँ पेनकिलर रखी है मुझे दे दो,” शीतल ने इशारा करते हुए कहा।
राज ने उसे दवा दी। शीतल की आँखों से दर्द के कारण आँसू बहे जा रहे थे वो बच्चों की तरह रो रही थी। राज उसे खुद से लिपटाकर चुप कराने की कोशिश कर रहा था,उसे दर्द बर्दाश्त करने का हिम्मत दे रहा था। उसने उसे कस कर अपनी बाहों में ज़कड़ रखा था। शीतल की सांस बहुत तेज चल रही थी।
“राज अभी भी दर्द हो रहा,मुझ से नही सहा जा रहा है,ठंड भी लग रही है,” शीतल बड़ी मुश्किल से बोल पाई। रोने की वजह से उसकी आवाज़ साफ नही निकल रही थी।
राज ने अपना कोट उसे ओढा दिया,उसके उपर से चादर और फिर उसे खुद से पहले की तरह लिपटाकर उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा जैसे की बच्चों का दर्द कम करने के लिए किया जाता है। राज के लिए शीतल किसी बच्ची से कम नही थी , जितने नखरे उसकी बेटी नही दिखाती थी उससे ज़यादा शीतल दिखाती थी। थोड़ी देर में शीतल को नींद आ गयी। राज ने उसे खुद से अलग किया और उसे लिटा दिया। शीतल को अभी भी हल्की-हल्की ठंड लग रही थी,उसे हल्का बुखार भी था। राज उसके पैर के तलवों को रगड़ने लगा जिससे उसे ठंड कम लगे। कुछ देर ऐसा करने के बाद वो शीतल की ओर मुँह करके बगल में लेट गया।
सुबह दोनों देर से उठे,पहले शीतल की आँख खुली,वो उठने लगी तो राज भी जाग गया।
“अब ठीक हो?” राज ने अपनी आँख मलते हुए पूछा।
“हाँ,” शीतल ने अंगड़ाई लेते हुए कहा।
“दर्द क्यों हो रहा था?”
“अभी सो कर उठे हैं……। थोड़ी देर बाद बात करते हैं।”
राज शांत हो गया।
2 घंटे बाद शीतल राज को चाय पकड़ाते हुए बोली-“कुछ कह रहे थे। ”
“दर्द पहली बार हो रहा था या पहले भी हो चुका है।”
“पहले भी हो चुका है,………। दवा ली है , कल रात को खाना भूल गयी इसीलिए होने लगा।”
“हो क्यों रहा था?”
“बच्चा गिर गया था ,तब से कभी भी दर्द होने लगता है।”
“तुमने किसी अच्छे डॉक्टर को नही दिखाया।”
“सरकारी अस्तपाल में दिखाया है,बोल रहे थे की ऑपरेशन करना पड़ेगा।”
“तो तुमने ऑपरेशन क्यों नही कराया?तुम पागल हो गयी हो। क्या कर रही हो ?अपनी जिंदगी के साथ?” राज ने थोड़ा गुस्से से कहा।
“मुझे ऑपरेशन नही कराना है…………। मैं दवा से ठीक हो जाऊंगी।”
“पागल मत बनो,……चलो मेरे साथ किसी अच्छे डॉक्टर के पास।”
“रहने दो,मुझे कहीं नही जाना।”
“मुझे कुछ नही सुनना है,तुम मेरे साथ चल रही हो।”
“क्यों मेरे पीछे पड़े हो?मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।”
“मुझे तुम्हारी कोई भी बात नही सुननी है,तुम अपनी मनमानी कर चुकी अब जैसा मैं कह रहा हूँ वो करो।”
“तुम चले जाओ,मैं जैसी भी हूँ ठीक हूँ।”
“मेरे साथ चलो।”
“नही चलना मुझे।”
राज शीतल का हाथ पकड़ के उसे घसीटते हुए बाहर लाया,बोला-“कैसे नही चलोगी?हर समय तुम्हारी मनमानी नही चलेगी।” राज ने बड़े ही गुस्से में कहा। शीतल कुछ नही बोल पाई। चुप-चाप गाड़ी में बैठ गयी।
रास्ते में दोनों ने एक-दूसरे से कोई बात नही की। राज ने एक-दो बार बात करने की कोशिश की लेकिन शीतल नही बोली।
डॉक्टर ने शीतल को कुछ टेस्ट करने को कहा।
रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर बोली-“आपका ऑपरेशन करने की अब कोई ज़रूरत नही है,मैं दवा लिख देती हूँ आपको आराम मिल जाएगा। ”
शीतल ने राज की ओर देखा जैसे कहने जा रही हो की अब कराओ ऑपरेशन,राज ने शीतल से अपनी नज़रें हटा ली। उसका शीतल पर गुस्सा करना बेकार था।
हॉस्पिटल से लौटते समय शीतल बोली-“क्या हुआ? अब नही कराना ऑपरेशन। ”
राज ने ऐसे जताया जैसे उसने बात सुनी ही नही।
“एक बार ऑपरेशन करा चुकी हूँ।”
“फिर मुझे बताया क्यों नही?”
“बस ऐसे ही।”
राज ने गाड़ी एक शॉपिंग माल के सामने रोकी।
“यहाँ किस लिए?” शीतल ने पूछा।
“तुम अपने लिए कुछ कपड़े ले लो।”
शॉपिंग करने के बाद दोनों किसी होटल में गये,वहाँ खाना खाया फिर ताजमहल देखने गये,उन्होने पूरा आगरा घूमा और करीब रात 9 बजे वो वापस लौटे।
शीतल गाड़ी में ही सो गयी थी,राज ने उसे जगाया नही,वो उसे अपनी गोद में उठा कर घर के अंदर लाया और लिटा दिया। आज शीतल अच्छी लग रही थी। राज कुछ देर तक उसे ही देखता रहा फिर उसने शीतल के माथे को चूमा और खुद वहीं उसके बगल में लेट गया।
सुबह जब राज वहाँ से जाने लगा तो उसकी हिम्मत नही हो रही थी की एक बार शीतल से पूछ ले कि क्या वो उसके साथ चलेगी?जानता था शीतल कभी हाँ नही कहेगी।
“क्या हुआ?तुम बहुत खोए हुए हो,” शीतल ने पूछा।
“कुछ नही…।”
“कुछ तो………मुझे छोड़ कर जाने का दिल नही कर रहा है,” शीतल ने कहा।
“गौरी के दिल में छेद है…………उसे देखभाल की बहुत ज़रूरत है।”
“तुम हो ना उसके लिए।”
“शीतल मुझसे नही होता,…………………। मैं हर पल उसके साथ नही रह सकता हूँ…………………। मेरे साथ चलो उसे उसकी माँ चाहिए।”
“मुझे इतना कमजोर मत करो कि मैं तुम्हारे बिना टूट जाऊँ……………।”
राज ने अपने आँसू को छिपाते हुए कहा-“कमजोर तो मैं हो गया हूँ तुम्हारे बिना,अगर गौरी ना होती तो कब का खुद को ख़त्म कर लिया होता।”
“हमारी किस्मत में मिलन से ज़्यादा जुदाई लिखी है………। तो इसमें हम क्या कर सकते हैं?”
“शीतल,अब तुम यहाँ से कहीं और नही जाओगी और मुझसे वादा करो की तुम्हें कोई भी तकलीफ़ होगी तो तुम मुझे बोल दोगी,” राज ने शीतल से कहा और उसे अपना डेबिट कार्ड दे दिया। “इसे रख लो तुम्हारे काम आएगा। ”
शीतल मना तो करना चाहती थी पर राज को मना नही कर सकी। राज वापस अपने घर लौट आया। कुछ दिन तक तो शीतल के बारे में ही सोचता रहा फिर धीरे-धीरे गौरी की वजह से खुश रहने लगा। वो अब अपने काम पर ध्यान कम और गौरी पर ज़्यादा देता, उसे ज़रा भी तकलीफ़ होती तो वो परेशान हो उठता था। आगरा से वापस लौटे हुए 10 दिन हो गये थे लेकिन राज ने एक भी दिन शीतल को फोन नही किया ना ही कभी शीतल ने।
राज और गौरी एक-दूसरे के साथ खेल रहे थे तभी किसी ने डोरबेल बजाई,गौरी जल्दी से भागती हुई गयी और दरवाजा खोला। राज भी उसके पीछे-पीछे दरवाजे तक आ गया। दरवाजे पर शीतल खड़ी थी। गौरी उसे देखती ही चिल्ला पड़ी-“पापा,पागल आई पागल………”
शीतल आश्चर्य से गौरी की ओर देखने लगी उसे हँसी भी आ गयी आख़िर गौरी उसे पागल क्यों कह रही है। राज भी गौरी की बात पर हँस दिया।
शीतल ने झुक कर गौरी को गोद में उठा लिया और पूछा-“मुझे पागल क्यों कहा?”
“मैंने आपकी फोटो देखी है,पापा,हर रोज मुझे आपकी फोटो दिखाते हैं और कहते है कि ये पागल की फोटो है,” गौरी ने कहा।
शीतल राज की ओर देखने लगी,बोली-“राज,इसे क्या सिखाया है?”दोनों एक साथ हँस दिए।
“हमेशा के लिए आई हो,”राज ने पूछा।
“हाँ,” शीतल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और अंदर आ गयी।
दिन भर घर में चहल-पहल बनी रही। गौरी की वजह से शीतल और राज आपस में बैठ कर बात नही कर सके। रात को गौरी के सोने के बाद दोनों छत पर बैठ कर बात करने लगे। शीतल राज की बाहों बाहें डालकर बैठी थी,उसके कंधे पर सिर रख कर।
“तुम आज इतनी सुंदर क्यों लग रही हो,” राज ने बोला।
“यहाँ आने से पहले पार्लर गयी थी,” शीतल ने कहा और खिलखिलाकर हँस दी।
“वापस आना था तो उसे दिन मेरे साथ क्यों नही आई?”
“खुद को पहले जैसा निखारना भी तो था,” शीतल ने कहा।
आज सच में दोनो खुश थे,उनको आज कोई भी गम नही था।
“तुम अभी आगे पढ़ाई करोगी?”
“हाँ,पढ़ाई पूरी करूँगी और साथ ही आई.ए.एस. की तैयारी भी।”
“अच्छा है,……………………। पर अगर फिर चली गयी तो।”
“नही जाऊँगी…………।”
“झूठी हो।”
“सच्ची-मुच्ची नही जाऊँगी,” शीतल ने बच्चों की तरह बोला।
“पक्का……………………वादा।”
“वादा……वादा………। वादा…………,” कहते हुए शीतल ने राज के गाल को हल्का-सा चूम लिया।
“बहुत बड़ी पागल हो,” राज ने कहा और खुद हट गया जिससे शीतल गिर गयी,शीतल राज के सहारे बैठी थी।
“आह,क्या हुआ?मुझे गिराया क्यों?”
“बस यूँ ही दिल कर रहा था।”
शीतल रोने का नाटक करने लगी,राज ने उसे उठा कर खुद से लिपटा लिया,शीतल उसकी इस हरकत पर बहुत ज़ोर से हँसी।
“तुमने मुझसे कहा था कि तुम किसी और से प्यार करती हो,कौन है वो?”राज ने पूछा।
“तुम्हारे लिए कहा था,जब से हमने शादी की है तभी से तुम्हे प्यार करती हूँ पर तुम कभी समझ ही नही पाए।”
“तुम इतना लड़ती ही थी और कुछ जय की वजह से नही लगा।”
“मैं मान भी तो जाती थी।”
“बस यही अच्छा लगता था,तुम कितना भी गुस्सा हो शांत होने पर सब भूल जाती थी।”
“और तुम हमेशा मुझे माफ़ कर देते।”
“तुम हो ही ऐसी कि……… ।”
“कैसी?”
“पागल।”
शीतल हल्का-सा मुस्कुरा दी।
“मैंने कुछ लिखा है हम दोनों के लिए,” शीतल ने कहा।
“क्या?”
“कभी तुम थे खफा,
तो कभी हम थे जुदा।
कभी तुम रूठे,
तो कभी हम रूठे।
लाख लिखीं मुक़द्दर ने जुदाई,
मगर हम फिर भी मिले।
क्योंकि,हम दोनों के दरमियाँ,
बस इतनी थी दूरियाँ । ”